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रत्नों में चिंतामणि, पर्वों में पर्युषण श्रेष्ठ
साध्वी त्रिशलाकुमारी जी के सान्निध्य में तेरापंथ भवन में पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व का शुभारम्भ हुआ। साध्वी रश्मिप्रभाजी 'खाद्य संयम दिवस' पर सारगर्मित विचारों की प्रस्तुति दी। आओ जाने अपने चतुर्थ आचार्य जीतमलजी की 'पवित्र साधना' केे विषय पर ओजस्वी वक्तव्य द्वारा नई गुर बताए। विशाल जनभेदनी को संबोधित करते हुए साध्वी त्रिशला कुमारी जी ने पर्युषण महापर्व की महत्ता को उजागर करते हुए कहा - हमारी भारतीय संस्कृति पर्वो और त्यौहारों की संस्कृति है। हर धर्म में अपने-2 पर्वो का महत्त्व होता है। मुस्लिम समाज में रमजान का महत्त्व है।
ईसाइयों के धर्म में क्रिसमस का त्यौहार बड़े धुमधाम से मनाया जाता है। वहीं बौद्धों में वैशाखी पर्व को बहुत ही उमंग के साथ मनाया जाता है। जैनधर्म में भी अनेक पर्व मनाये जाते है लेकिन आज जिस पर्व को हम मना रहे है वह पर्व ही नहीं महापर्व है। महर्षि गौतम ने बहुत ही सुन्दर कहा है- रत्नों में चिन्तामणि रत्न का महत्त्व है तो दान में अभयदान सर्वश्रेष्ठ है ध्यान में शुक्ल ध्यान की विशेष महिमा है ठीक पर्वो में महापर्व पर्युषण का विशेष महत्त्व है। कार्यक्रम का सुन्दर संचालन साध्वी कल्पयशा जी ने किया।