विवेक और संयम के साथ कम बोलने से वाणी में आती है मधुरता

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विवेक और संयम के साथ कम बोलने से वाणी में आती है मधुरता

प्रवक्ता उपासक विनोद कुमार बोरदिया ने वाणी संयम के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि अनावश्यक नहीं बोलना भी वाणी संयम का ही एक रूप है। व्यक्ति जब बोले, तो तोलकर, मृदु एवं विवेकपूर्ण वाणी बोले। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति विवेक और संयम के साथ कम बोलता है, उसकी वाणी में मधुरता आ जाती है। मौन की साधना से वचन सिद्धि संभव है। शरीर की सुंदरता नश्वर है, लेकिन आत्मा को पवित्र एवं सुंदर बनाने का प्रयास करना आवश्यक है। सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन, सम्यक चरित्र और संयम-तप की साधना ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करती है तथा साधक को अपनी मंजिल तक पहुंचाती है। उपासक बोरदिया ने आचार्य श्री तुलसी की रोचक गीतिकाओं के माध्यम से श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया और धर्मसभा में आध्यात्मिक वातावरण बना दिया। इस अवसर पर उपासक रतनलाल मेहता ने जीवन जीने की कला पर प्रेरणादायी उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में विलासिता और अहंकार का प्रवेश नहीं होना चाहिए। व्यसनों से दूर रहकर गलत व्यवहार से बचना चाहिए। उन्होंने भगवान महावीर के जीवन एवं संदेशों का रोचक वर्णन करते हुए उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं को प्रेरित किया। इसके पश्चात उन्होंने प्रेक्षाध्यान का प्रयोग एवं कायोत्सर्ग करवाया। इंद्रचंद बैद 'कवि' ने बताया कि निकाय चुनाव के मतदान दिवस होने के बावजूद लोगों में धर्म के प्रति गहरा आकर्षण बना रहा। बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने धर्मसभा में उपस्थित होकर आराधना का लाभ लिया।