रचनाएं
समर्पण की नजीर को सर्वस्व अर्पण कर दिया
भैक्षवगण के भव्य भास्कर रम्य है, प्रणम्य है।
ज्योतिचरण की हर विधि नम्य है अगम्रू है।।
गणपाल ने रिछपाल खातिर मनोनयन जो है किया।
समर्पण की नजीर को सर्वस्व अर्पण कर दिया।।
नाम है महावीर धीर गंभीर निर्मल नीर ज्यो।
तान सुन गलतान होते सरगम बजे जब बीन ज्यों।।
ओज आहार महाप्रज्ञ से पा ओजस्विता बढ़ती गई।
वरदृहस्त महाश्रमण का वर्चस्विता फलती गई।।
उदितोदित तेजस्विता लख शीष श्रद्धा से झुक रहे है।
यशस्विता तपस्विता को लखदाद जन-जन दे रहे है।।
वर्धापना के पल सुहाने ज्वार भक्ति का प्रबल है।
सनाथ है यह संघ संघ के नाथ संबल और सबल है।।