नई सर्जना युवराजा की, अनहद खुशियां छाई है

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साध्वी शीतलयशा

नई सर्जना युवराजा की, अनहद खुशियां छाई है

नई सर्जना युवराजा की, अनहद खुशियां छाई है
तेरापंथ संघ की गरिमा, शिखरों तक पहुंचाई है।।
मुख्य मुनि का अलंकरण दे, नेपाल धरा पर किया चयन
चार तीर्थ में पुलकन भरकर, तृप्त कर दिये सभी नयन
श्रेष्ठ श्रुताराधक बन करके, आगम का नित करे गमन
पंचामृत निष्ठायूत जीवन, मूरत सबको भाई है।।1।।
विनय, समर्पण, सहिष्णुता अरू, गुरू आज्ञा है लक्ष्य महान
अल्पकषायी, मितभावी है, संगायन का ले वरदान
गुरू की छत्रछांव बन करके, चरण युगल करते प्रस्थान
वीर-गोयम की जोड़ी मनहर, देख रहा है सकल जहान
महाश्रमणजी निश्चिन्त बने अब, गण को दी उंचाई है।।2।।
भिक्षु जन्म त्रिशताब्दी सुखकर, महावीर का निर्वाचन
योगक्षेम वर्ष यह पावन, सीन दिखाया मन भावन
सभा सुधर्मा प्रमुदित प्रभुवर, पुलकित चंदेरी कण-कण
नीवें गहरी की गण नायक, हरा-भरा यह नंदन वन
श्वेत चदरिया स्वयं ओढ़कर, पट्टघर को ओढ़ाई है।।3।।