तेरापंथ का उजला स्वर्णिम भविष्य : युवाचार्य श्री महावीर मुनि

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धर्मेन्द्र डाकलिया (पूर्व संपादक, जैन तेरापंथ न्यूज) l (2019-2020)

तेरापंथ का उजला स्वर्णिम भविष्य : युवाचार्य श्री महावीर मुनि

धोरों की धरती से निकलकर भिक्षु पट की शोभा का नाम है : युवाचार्य श्री महावीर मुनि
1. फलसुंड का प्रारंभिक परिवेश और धार्मिक परिवर्तन : रेगिस्तानी भूभाग का सिरमौर जैसलमेर जिले की सीमा से लगे प्राचीन कस्बे फलसुंड का परिवेश कभी धार्मिक दृष्टि से अपेक्षाकृत उपेक्षित रहा था। रेगिस्तानी भूभाग, सीमित आवागमन और तेरापंथी साधु-साध्वियों के दीर्घ सान्निध्य के अभाव के कारण यहाँ के जैन परिवारों में जैन धार्मिक संस्कारों का पर्याप्त विकास नहीं हो पाया था। यद्यपि नगर में जैन समाज मौजूद था, फिर भी वहाँ की धार्मिक जीवन-पद्धति पर कबीरपंथी विचारधारा का प्रभाव अधिक दिखाई देता था। आसपास के तेरापंथ-बहुल क्षेत्रों से दूरी और साधु-साध्वियों के नियमित विहार का अभाव भी इसका एक प्रमुख कारण था।
तेरापंथ के आचार्य श्री तुलसी ने फलसुंड की इस स्थिति के भीतर छिपी संभावनाओं को बहुत पहले पहचान लिया था। उनके निर्देश पर साध्वी श्री रतनकुमारी आदि साध्वियों को वहाँ भेजा गया। वरिष्ठ मुनि मोहनलाल जी ‘आमेट’ ने भी फलसुंड क्षेत्र की बार-बार सार-संभाल की और कठिन परिस्थितियों में लंबी यात्राएँ कर वहाँ धार्मिक संस्कारों का बीजारोपण किया। 1972 में मुनि श्री वत्सराज जी के फलसुंड आगमन और उनकी प्रेरणा से वहाँ के जैन श्रावकों द्वारा आचार्य श्री तुलसी से गुरु-धारणा करने की घटना ने इस परिवर्तन को आगे बढ़ाया। इसके बाद भी समय-समय पर साधु-साध्वियों के आगमन से जैन समाज को अपने धर्म की विधियों और सिद्धांतों को समझने का अवसर मिलता रहा।
फलसुंड के धार्मिक जीवन में निर्णायक परिवर्तन 1989 में साध्वी श्री रूपांजी के आगमन से हुआ। उनका 62 दिनों का दीर्घ प्रवास स्थानीय समाज के लिए आशा की नई किरण बना। उनके सान्निध्य में फलसुंड के जैन परिवारों को जैन धर्म की बारीकियों को समझने और अपनी धार्मिक आराधना को जैन पद्धति के अनुरूप करने का अवसर मिला। इस दौरान अनेक परिवार तेरापंथ से जुड़ने लगे।
2. बाल्यकाल और दीक्षा का पथ : इसी धार्मिक वातावरण में महावीर का बाल्यकाल बीता। सवाईचंद जी कोचर के परिवार में जन्मे बालक महावीर पर साध्वी श्री रूपांजी का विशेष ध्यान गया। अत्यंत छोटी आयु में भी उनमें साधु-साध्वियों के प्रति मर्यादा, अनुशासन और संयम की सहज समझ दिखाई देती थी। साध्वी श्री रूपांजी ने उनके व्यक्तित्व की विलक्षणता को पहचानते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की भविष्यवाणी की और उनके संस्कारों पर आधारित पंक्तियाँ भी रचीं। महावीर के व्यक्तित्व में आध्यात्मिक संस्कार और वैराग्य की भावना बचपन से ही विकसित हो रही थी।
फलसुंड के धार्मिक विकास के साथ महावीर के जीवन में भी निर्णायक मोड़ आया। आचार्य महाप्रज्ञ जी के सान्निध्य में उन्होंने छोटी आयु में ही अपने अंतर्मन की वैराग्य-भावना सार्वजनिक रूप से व्यक्त की और दीक्षा की इच्छा प्रकट की। गुरु की अनुमति तथा पिता की आज्ञा के बाद 3 मार्च 2002 को जसोल में महावीर की दीक्षा संपन्न हुई। पौने तेरह वर्ष की आयु में महावीर कुमार से महावीर मुनि बने इस बालक ने आगे चलकर अध्ययन, साधना और संघ-सेवा में स्वयं को समर्पित किया।
3. शैक्षणिक व आध्यात्मिक उपलब्धियाँ: उन्होंने सात वर्षीय पाठ्यक्रम में प्रथम स्थान प्राप्त कर 'श्रेष्ठ श्रुतराधक' का अलंकरण पाया, विश्वविद्यालय स्तर पर उत्कृष्ट प्रदर्शन किया तथा जैन विश्व भारती में एम.ए. की शिक्षा पूर्ण की। अनेक जैन ग्रंथों और श्लोकों का अध्ययन एवं स्मरण, संस्कृत में भाषण, गीत-गायन में उपलब्धि तथा विभिन्न संघीय दायित्वों में सक्रिय सहभागिता उनके ज्ञान, अध्ययनशीलता और प्रतिभा को रेखांकित करती है। वर्ष 2022 में उनके शोध-प्रबंध 'जैन आगमों में पर्यावरणीय चिंतन : एक अध्ययन' के लिए उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान की गई।
4. ऐतिहासिक परिवर्तन और युवाचार्य पद : जिस रेगिस्तानी कस्बे में कभी साधु-साध्वियों का नियमित सान्निध्य दुर्लभ था, वहीं से एक प्रतिभाशाली बालक का संयम-पथ पर अग्रसर होकर संघ के महत्वपूर्ण दायित्व तक पहुँचना एक उल्लेखनीय परिवर्तन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आचार्य महाश्रमण जी द्वारा उनकी प्रतिभा और साधना को पहचानकर उन्हें 'मुख्य मुनि' और फिर युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी के रूप में मनोनीत किया जाना फलसुंड के इतिहास का नया अध्याय है।
सार रूप में हम कह सकते हैं कि संस्कार, गुरु-सान्निध्य, अध्ययन, साधना, प्रतिभा और समर्पण मिलकर किसी व्यक्ति तथा समाज के भविष्य को दिशा दे सकते हैं। फलसुंड की धार्मिक यात्रा और महावीर मुनि का जीवन इस परिवर्तन की दो परस्पर जुड़ी हुई धाराओं के रूप में सामने आते हैं। मरुस्थल की कठिन भूमि में जिस प्रकार धार्मिक चेतना विकसित हुई, उसी वातावरण से महावीर मुनि का व्यक्तित्व उभरा और उन्होंने ज्ञान, दर्शन तथा चारित्र की साधना के माध्यम से तेरापंथ संघ में युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी के रूप में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। इस अर्थ में 'तेरापंथ का स्वर्णिम भविष्य' केवल किसी एक व्यक्ति की उपलब्धि का वर्णन नहीं, बल्कि संस्कारों और सतत साधना से निर्मित भविष्य की संभावनाओं का चित्रण है।