युवाचार्य महावीर - साधना की ऊंचाई, संकल्प की दृढ़ता

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संजय वेदमेहता, पूर्व कार्यकारी संपादक, JTN l (2017–2019)

युवाचार्य महावीर - साधना की ऊंचाई, संकल्प की दृढ़ता

तेरापंथ धर्मसंघ की पहचान साधना की उत्कृष्टता और दृढ़ आचार निष्ठा के साथ एक गुरु एक अनुशासना की सुदृढ़ परंपरा से है। तेरापंथ के आद्य प्रवर्तक महामना आचार्य भिक्षु ने मर्यादा रची कि उत्तराधिकार का निर्णय वर्तमान आचार्य द्वारा लिया जाएगा एवं सभी को वह सहर्ष स्वीकार होगा। परमपूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में मुख्य मुनि महावीरकुमार जी को युवाचार्य के रूप में मनोनीत कर इसी परंपरा को सुदृढ़ता प्रदान की और धर्मसंघ को निश्चिंतता प्रदान की है।
युवाचार्य घोषणा : दीक्षाभूमि जसोल का आनंदमय वातावरण : युवाचार्य पद की घोषणा के उन ऐतिहासिक क्षणों का साक्षी बनने के लिए मैं लाडनूं में तो उपस्थित नहीं रह सका, लेकिन उन अनुपम क्षणों की अनुभूति मुझे जसोल में रहकर भी गहराई से हुई। घोषणा के समय दीक्षा भूमि जसोल में साध्वी कुन्दनप्रभा जी आदि ठाणा 4 के सान्निध्य में श्रावक समाज के बीच श्रद्धा, उत्साह और प्रसन्नता का जो वातावरण बना, उसका मैं स्वयं साक्षी रहा। हर चेहरे पर गौरव, हर हृदय में आस्था और हर शब्द में मंगलभाव दिखाई दे रहा था। ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो सिवांची मालाणी की पावन धरती अपने ही संयम-सपूत के गौरव से आनंदित हो उठी हो।
लघु वय में वैराग्य का जागरण : राजस्थान के जैसलमेर जिले के छोटे से ग्राम फलसुंड में पले-बढ़े बालक महावीर के अंतर्मन में प्रारंभ से ही वैराग्य और आध्यात्मिक चेतना के संस्कार विद्यमान थे। मात्र तेरह वर्ष की अल्पायु में उन्होंने जसोल में परमपूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी के करकमलों से जैन भागवती दीक्षा स्वीकार की। इतनी छोटी आयु में संयम-पथ का वरण करना उनके भीतर निहित आध्यात्मिक संस्कारों, दृढ़ संकल्प और आत्मिक सामर्थ्य का परिचायक था।
संकल्प की दृढ़ता-साधना की ऊंचाई : दीक्षा के पश्चात् गुरुओं की कृपा और मार्गदर्शन ने उनके व्यक्तित्व को निरंतर निखारा। ज्ञान, ध्यान, स्वाध्याय और सेवा के क्षेत्र में उनकी उपलब्धियों ने उन्हें साधु-संघ की अग्रिम पंक्ति में प्रतिष्ठित किया। उनके जीवन में ज्ञान की गहराई, दर्शन की स्पष्टता और आचरण की निर्मलता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। उनकी जीवनयात्रा यह संदेश देती है कि साधना की ऊँचाई आयु से नहीं, संकल्प की दृढ़ता से निर्धारित होती है।
योगक्षेम की व्यापक दृष्टि : युवाचार्य श्री महावीर मुनि की चिंतन-दृष्टि में धर्मसंघ की परंपराओं, आचार-विचार और मूल्यों का संरक्षण जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है- समय के अनुरूप नई उपलब्धियों और रचनात्मक आयामों का विकास। सघन साधना शिविरों की आयोजना में उनका योगक्षेम चिंतन और श्रम संघ की संपदा में श्रीवृद्धि के रूप में फलित हो रहा है।
नयी पीढ़ी-नयी आशा : हम लगातार देखते है कि युवाचार्य प्रवर संघीय संस्थाओं के युवा कार्यकर्ताओं को केवल सामाजिक गतिविधियों तक सीमित न रहकर आत्म-विकास, संयम, साधना और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देते हैं। बालकों व किशोरों को भी शुरुआती अवस्था में ही आध्यात्मिकता से जोड़ने को मानो उन्होंने पहली प्राथमिकता दी है। युवाचार्य प्रवर के चिंतन और प्रेरणा से निश्चित ही नई पीढ़ी को नई दिशा मिल रही है।
वर्धापना व श्रद्धासिक्त अभिनंदन : वर्धापना का वास्तविक अर्थ केवल आयु या पद की वृद्धि का अभिनंदन करना नहीं, बल्कि उस तपःपूत जीवन के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना है, जो निरंतर दूसरों के कल्याण के लिए समर्पित है। इस पावन अवसर पर युवाचार्यश्री महावीर मुनि के चरणों में कोटिशः वंदन एवं हार्दिक अभिनंदन। आध्यात्मिक साधना की उनकी यात्रा निरंतर उन्नत होती रहे, परमपूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी की कृपादृष्टि में वे संघ के योगक्षेम को और अधिक सुदृढ़ करें तथा तेरापंथ धर्मसंघ की संपदा, प्रतिष्ठा और प्रभावना में निरंतर श्रीवृद्धि करते रहें, मंगलभावों सहित ।