युवाचार्य श्री महावीरकुमार जी : आत्मानुशासन से आत्म-कल्याण की ओर

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महावीर सेमलानी, पूर्व कार्यकारी संपादक, JTN l (2014 - 2017)

युवाचार्य श्री महावीरकुमार जी : आत्मानुशासन से आत्म-कल्याण की ओर

1. गुरु-शिष्य परंपरा और ऐतिहासिक मनोनयन : तेरापंथ धर्मसंघ की गुरु-शिष्य परम्परा भारतीय साधना-जगत की एक अनुपम कड़ी है। आचार्य भिक्षु से प्रारम्भ हुई यह दिव्य शृंखला आचार्य कालूगणी, आचार्य तुलसी, आचार्य महाप्रज्ञ होते हुए वर्तमान युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण तक निर्बाध रूप से प्रवाहित हो रही है। इसी परम्परा में एक नया और गौरवशाली अध्याय तब जुड़ा, जब आचार्य श्री महाश्रमण ने मुख्य मुनि श्री महावीर कुमार जी को धर्मसंघ के युवाचार्य पद पर आसीन कर उन्हें भावी उत्तराधिकारी घोषित किया। आचार्य भिक्षु के 301वें जन्म-दिवस पर आयोजित बोधि दिवस समारोह के पावन प्रसंग पर हुई यह घोषणा संपूर्ण तेरापंथ समाज के लिए हर्ष और गौरव का अवसर बन गई।
2. दीक्षा से युवाचार्य तक की प्रेरक साधना-यात्रा : युवाचार्य श्री की साधना-यात्रा भी अत्यंत प्रेरक रही है। वर्ष 2001 में गंगाशहर के मर्यादा महोत्सव के अवसर पर पिता सवाईसिंह जी और पुत्र महावीर जी की जोड़ी ने भावपूर्ण संगीतमय अनुनय-विनय के साथ दीक्षा की भावना व्यक्त की थी। तत्कालीन आचार्य महाप्रज्ञ जी ने उन्हें दीक्षित किया और तभी युवाचार्य महाश्रमण जी (वर्तमान आचार्यश्री) को यह निर्देश भी दिया कि मुनि महावीर को सदैव अपने सान्निध्य में रखें। इसी दीर्घ सान्निध्य में रहकर उन्होंने आध्यात्मिक साधना, संघ-व्यवस्था, अध्ययन, अनुशासन और संगठनात्मक दायित्वों का कुशलता से निर्वहन किया, जिसने उन्हें संत-समाज और श्रद्धालुओं के बीच विशेष सम्मान दिलाया।
3. व्यक्तित्व के बहुआयामी गुण एवं आचार्य तुलसी की झलक : युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी का व्यक्तित्व अनेक विशिष्ट गुणों का अद्भुत संगम है। उनके सुशिष्यों और संत-समाज के अनुसार उनका स्वभाव सहजता, मृदुता, शांति और आध्यात्मिक गरिमा से ओतप्रोत है। उनकी सबसे बड़ी विशेषता है उनकी सरलता, विनम्रता और आत्मीयता — जिसमें किसी प्रकार का आडंबर नहीं, बल्कि सहज भावों का स्वाभाविक प्रवाह दिखाई देता है। वे आगम-वाणी के गहन मर्मज्ञ और श्रुत के सच्चे आराधक माने जाते हैं। उनकी विद्वता, विनय, विवेक और सहिष्णुता अनुकरणीय है, तो साथ ही अनुशासित जीवन-शैली और सेवा-भावना उनके चरित्र की पहचान है। तप, समर्पण और संघ-निष्ठा के गुण उनमें कूट-कूट कर भरे हैं, और यह भी उल्लेखनीय है कि उनमें आचार्य तुलसी के अनेक महनीय गुणों की झलक भी देखी जाती रही है — जो इस बात का प्रमाण है कि धर्मसंघ को एक ऐसा कुशल मार्गदर्शक मिला है, जो पूर्ववर्ती आचार्यों की तपस्या और साधना की विरासत को सहज ही आगे बढ़ाने में समर्थ है।
4. सामाजिक जागरण, गुरु-परीक्षण और मंगल-अभिलाषा: नैतिकता, नशामुक्ति, सद्भावना और मानवता के संदेश के प्रचार-प्रसार में युवाचार्य श्री की भूमिका देश-विदेश में सराही जाती रही है। उनके मार्गदर्शन में धर्मसंघ ने आध्यात्मिक, नैतिक एवं सामाजिक जागरण के अनेक अभियान संचालित किए हैं, जिनसे समाज में संयम और मानवीय मूल्यों की चेतना जाग्रत हुई है। किसी भी योग्य उत्तराधिकारी के चयन से पूर्व गुरु द्वारा किया जाने वाला दीर्घकालिक और सर्वांगीण परीक्षण तेरापंथ की विशिष्ट परम्परा रही है, और युवाचार्य श्री इस कसौटी पर पूर्णतः खरे उतरे हैं — यही उनकी सबसे बड़ी विशेषता और उपलब्धि है। इस पावन वर्धापन के अवसर पर संपूर्ण तेरापंथ समाज की ओर से युवाचार्य श्री के दीर्घ, स्वस्थ एवं तेजस्वी जीवन की मंगल कामना की जाती है। आचार्य प्रवर और युवाचार्य प्रवर के कुशल संयुक्त मार्गदर्शन में धर्मसंघ निरंतर विकास और आध्यात्मिक उन्नति के नए सोपान तय करे — यही हार्दिक शुभकामना है। उनकी सहजता, विद्वता और सेवा-निष्ठा से युक्त यह उज्ज्वल व्यक्तित्व न केवल तेरापंथ धर्मसंघ के लिए, अपितु समग्र मानवता के लिए अहिंसा, संयम और आत्म-कल्याण का एक नया मार्ग प्रशस्त करे, यही मंगल भावना है।