क्षमा पर्व — आत्मा का परम सौंदर्य और साधना का मार्ग क्षमा वीरस्य भूषणम्— क्षमा वीरों का आभूषण है

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साध्वी रौनक प्रभा

क्षमा पर्व — आत्मा का परम सौंदर्य और साधना का मार्ग क्षमा वीरस्य भूषणम्— क्षमा वीरों का आभूषण है

१. क्षमा का मूल स्वरूप एवं महत्व
क्षमा मांगने से अहंकार ढलता है और गलता है, तो क्षमा करने से सुसंस्कार पलता है और चलता है। क्षमा शीलवान का श्रेष्ठ शस्त्र है और अहिंसक का अमोघ अस्त्र। यह प्रेम का परिधान, विश्वास का विधान, सृजन का सम्मान और नफरत का अचूक निदान है। क्षमा आत्मा में पवित्रता का प्रवाह, नैतिकता का निर्वाह, सद्गुणों का संवाद और अहिंसा का जीवंत अनुवाद है।
क्षमा दिलेरी के दीपक में दया की ज्योति है तथा अहिंसा की अंगूठी में मानवता का मोती है। कमजोर, असमर्थ अथवा कायर व्यक्ति कभी क्षमा करने की शक्ति धारण नहीं कर सकता। जो आत्मबल से संपन्न है, समर्थ है और वीर है, वही सच्चा क्षमावान हो सकता है। संसार में सबसे अधिक शक्तिशाली तीर्थंकर होते हैं, अतः वे ही सबसे अधिक क्षमावान भी होते हैं।
२. शास्त्रों का संदेश
क्रोध शांत करने के लिए भगवान महावीर और जैन आगमों में कहा गया है:
उवसमेण हणे कोहं, माणं मद्दवया जिणे।
माया मज्जव भावेण, लोहं संतोसओ जिणे॥
अर्थ:
क्रोध को शांति (उपशम) से जीतो, अहंकार को नम्रता (मृदुता) से जीतो,
छल-कपट (माया) को सरलता (आर्जव) से जीतो, और लोभ को संतोष से जीतो।
यही शांति का शाश्वत मार्ग है। वैर-भाव की अग्नि को शांत करने के लिए क्षमा का शीतल जल ही आवश्यक है। जिस प्रकार राख फेंकने वाले के स्वयं के मुंह पर राख उड़कर आती है, उसी प्रकार गाली या अपशब्द देने वाले का बुरा स्वयं ही होता है।
३. महापुरुषों के प्रेरक दृष्टांत
 संत समर्थ रामदास और गृहस्वामिनी:
   संत समर्थ रामदास एक घर के द्वार पर भिक्षा मांगने गए। गृहस्वामिनी उस समय अत्यधिक क्रोध में थी और उसने रसोई साफ करने का गंदा कपड़ा (मसोता) संत के मुंह पर फेंक दिया। समर्थ रामदास शांत रहे, सीधे नदी पर गए, उस कपड़े को धोकर साफ किया और उसकी बाती बनाकर शाम को ईश्वर की आरती में जलाया। उन्होंने प्रार्थना की— 'हे प्रभु! जैसे यह बाती अंधकार दूर कर रही है, वैसे ही उस महिला के मन का अज्ञान और अंधकार भी दूर हो।' यह है क्रोध को क्षमा से जीतने का अनूठा उदाहरण।
 आचार्य भिक्षु का विनोद और विवेक
घाणेराव में कुछ लोगों ने आचार्य भिक्षु से कहा— 'तुझे देखने वाला नरक में जाता है।' आचार्य श्री ने सहजता से पूछा— 'और आपका मुंह देखने वाला?' वे बोले— 'वह तो स्वर्ग जाता है।' आचार्य भिक्षु ने मुस्कुराते हुए कहा— 'तब तो मेरे लिए बहुत अच्छा हुआ, मुझे तो स्वर्ग ही मिलेगा क्योंकि मैंने आपका मुंह देख लिया!' विरोध तुरंत विनोद में बदल गया और आवेश का रोष क्षमा की सरिता में बह गया।
 भगवान बुद्ध और अपशब्दों का उपहार
   जब एक व्यक्ति ने भगवान बुद्ध को कटु वचन और गालियां दीं, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा— 'यदि तुमने मुझे कोई उपहार दिया और मैंने उसे स्वीकार ही नहीं किया, तो वह उपहार किसके पास रहा? निश्चित ही तुम्हारे पास।' बुद्ध ने स्पष्ट किया कि अपशब्द बोलने वाले के पास ही रह जाते हैं यदि हम उन्हें स्वीकार न करें।
४. जीवन में क्षमा भाव कैसे बढ़ाएं? (३ व्यावहारिक चरण)
क्षमा भाव को बढ़ाने और दैनिक जीवन में उतारने के ३ मुख्य सूत्र हैं:
यह समझें कि हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सर्वश्रेष्ठ (Best) दे रहा है-
जैसे एक छोटे बच्चे की नादानी, रोने या गंदगी फैलाने पर माता-पिता उस पर गुस्सा नहीं करते क्योंकि वे जानते हैं कि बच्चे की समझ की सीमा यही है। उसी प्रकार, जब कोई हमारे साथ बुरा व्यवहार या धोखा करे, तो यह समझें कि उसकी चेतना, मानसिक स्थिति और जीवन के अनुभवों की अपनी सीमाएं हैं। जैसे एक तितली पर्वत पार नहीं कर सकती और छोटा पक्षी समुद्र पार नहीं कर सकता, वैसे ही कोई व्यक्ति अपनी समझ के स्तर से परे जाकर व्यवहार नहीं कर सकता। यह सोच आते ही दूसरों को माफ करना आसान हो जाता है।
पाप से घृणा करें, पापी से नहीं 
(Let's not hate the hater):
   महात्मा गांधी के आश्रम में जब एक चोर पकड़ा गया, तो गांधी जी ने उसकी विवशता समझकर उसे क्षमा कर दिया और संदेश दिया— 'नफरत पाप से करो, पापी से नहीं।' किसी व्यक्ति की भूल उसका स्थायी स्वरूप नहीं, बल्कि तात्कालिक व्यवहार (Behaviour) है। आत्मा मूलतः पवित्र है। परिस्थिति या अज्ञानता के कारण हुई भूल के आधार पर व्यक्ति को हमेशा के लिए बुरा मानना उचित नहीं है।
यह स्वीकार करें कि कोई भी पूर्ण (Perfect) नहीं है:
   हम अक्सर दूसरों पर गुस्सा इसलिए होते हैं क्योंकि हम स्वयं को परफेक्ट मानने लगते हैं और चाहते हैं कि दुनिया हमारे हिसाब से चले। परंतु हकीकत यह है कि हम खुद भी अनेक गलतियां करते हैं। जब हम अपनी कमियों के बावजूद खुद को माफ कर देते हैं, तो दूसरों को माफ करने में कठोरता क्यों? इस सत्य को स्वीकारते ही क्षमा सहज हो जाती है।
निष्कर्ष (F2 Formula)
इन ३ विचारों को मन में रखकर तथा F2 Formula — Forgive & Forget (क्षमा करें और भूल जाएं) की थेरेपी अपनाकर हम अपनी क्षमा-शक्ति का पूर्ण विकास कर सकते हैं और जीवन में परम शांति प्राप्त कर सकते हैं।