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ऊर्ध्वारोहण की दिशा मैत्री
भारतीय संस्कृति में पर्वों के अनेक रूप हैं, उसी का एक रूप है आध्यात्मिक पर्व पर्युषण महापर्व। अनादि अनन्त इन शाश्वत परंपराओं में पर्युषण पर्व की अपनी महत्ता है। सालभर इंसान अनेक भूलें करता है, अनेक तरह का व्यवहार करता है। यहाँ-वहाँ कुछ-न-कुछ होता रहता है। जब तक इंसान मुक्ति तक नहीं पहुँचता, तब तक उसका संसार चलता रहता है। अनेक तरह से इसी जीवन में अनुभव होते रहते हैं, अनुभवों के आधार पर इंसान चलता रहता है। कभी किसी से मित्रता कर लेता है तो कभी किसी से दुश्मनी भी कर लेता है, ऐसे छोटे-मोटे दुर्गुणों के बीच जीवन बीतता है, मगर स्वयं का स्वयं से दर्शन नहीं होता।
स्वयं को आत्मा तक पहुँचाने हेतु, पर्युषण पर्व आता है और क्षमा धर्म को समझाता है। हम सभी जानते हैं इंसान का स्वभाव शांति है, लेकिन जब तक क्रोध, मान, माया, लोभ इन चारों कषायों की बहुलता रहती है, तब तक जीवन में सरलता नहीं आती। जब तक सरलता (समता) नहीं आती, तब तक जीवन की सार्थकता समझ में भी नहीं आती। भगवान महावीर ने मुक्ति तक जाने के लिए ज्ञान, दर्शन, चरित्र और तप की आराधना बताई है।
पर्युषण पर्व मुख्य रूप से सिखाता है:
१. मन, वचन और काय का संयम: स्वयं आत्मा के करीब रहना और दूसरों की भावना को समझना।
२. प्रायश्चित : वर्षभर में अनजाने में हुई गलतियों का त्याग और तपस्या द्वारा तन-मन से प्रायश्चित करना।
३. मैत्री का आह्वान : जगने का तथा सभी जीवों के साथ मैत्री करने का संदेश।
भगवान महावीर ने अहिंसक चित्र पर ज्यादा जोर दिया, उनकी प्रसिद्ध उक्ति है—
'खामेमि सब्व जीवे, सब्वे जीवा खमन्तु मे।
मित्ती मे सब्व भूएसु, वेरं मज्झ न केणई॥'
'मैं सब जीवों से क्षमा मांगता हूँ, सब जीव मुझे क्षमा प्रदान करें। मेरा सबसे मैत्री भाव है, किसी से मेरा बैर विरोध नहीं है।' भगवान महावीर जब क्षमा का आह्वान करते हैं, तो उनके सामने केवल आज नहीं है, उनके साथ पूरा अतीत जुड़ा है।
चित्त को निर्मल बनाने के लिए ही उन्होंने ध्यान के रूप में अहिंसा के लंबे प्रयोग किए। वर्तमान में अहं भरी जीवनशैली में जो इंसान करुणा, मैत्री तथा प्रेम को समझता है, वही मैत्री को समझ सकता है, उसके हार्द तक पहुँच सकता है और दूसरों को रस देना भी जानता है।
मैत्री के दो प्रमुख पक्ष :
१. दार्शनिक पक्ष : 'आत्मतुल्यता का सिद्धांत' (दूसरों को अपने समान समझना)।
२. प्रायोगिक पक्ष : सभी का हित चिंतन करना और दूसरों को रस (प्रेम/आनंद) देना।
एक प्रेरक दृष्टांत :
एक दिन राजा ने अपनी दोनों महारानियों को बुलाया और बिना ईंधन के केवल ईख (गन्ने) का प्रयोग करके रसोई बनाने को कहा। बड़ी रानी ने सीधा ईख चूल्हे में डाल दिया, जिससे चारों तरफ धुआँ उठा और खाना बनना संभव नहीं हुआ। लेकिन छोटी रानी समझदार थी; उसने बच्चों को ईख चूसने के लिए दिया और उनके द्वारा फेंके गए छिलकों से आग जलाकर रसोई तैयार कर दी।
जो दूसरों को रस देना नहीं जानता है, धुआँ वही होता है। यह मैत्री का प्रायोगिक रूप है। मैत्री के विकास के लिए शक्ति का विकास, शक्ति के लिए सहिष्णुता, और उसके लिए निर्मलता का विकास जरूरी है।
भगवान महावीर मैत्री के महान प्रवर्तक थे, उन्होंने जन-जन को मैत्री का पाठ पढ़ाया। वे एक कुशल चिकित्सक थे। जैसे माली की देखभाल और कांट-छांट से ही बगीचे के सौंदर्य को बरकरार रखा जा सकता है, वैसे ही बुराई अंतरव्रण पैदा करती है। एक सड़ा हुआ पान अनेक पान को सड़ा देता है। सामाजिक जीवन में भिन्न-भिन्न रुचि, विचार व संस्कार से राग-द्वेष की ग्रंथि घुलने लगती है। ग्रंथि विमोचन के लिए पाक्षिक, चातुर्मासिक व संवत्सरी प्रतिक्रमण किया जाता है और एक दूसरे से आपस में 'खमतखामणा' करते हैं।
धर्म की पहली सीढ़ी सम्यग्दर्शन है—अपनी तरफ से क्षमा दे दो। मैत्री-क्षमा हमारे आत्म-विकास का सुरक्षा कवच है। परभाव से स्वभाव में लौटने की प्रक्रिया ही प्रतिक्रमण है और इसका फलित है 'खमतखामणा'। 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की इसी भावना को प्रस्तुत करता है क्षमापर्व।
प्रेम के दीप अब नहीं जले तो कब जलेंगे?
अमन के फूल अब नहीं खिले तो कब खिलेंगे?
भूल-गिले, शिकवों को कर दिल से क्षमायाचना,
टुकड़े हुए दिल अब नहीं मिले तो कब मिलेंगे?