‘तुलसी और महाप्रज्ञ जैसे युगप्रधानों के निर्माता थे आचार्य कालूगणी’ : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

‘तुलसी और महाप्रज्ञ जैसे युगप्रधानों के निर्माता थे आचार्य कालूगणी’ : आचार्यश्री महाश्रमण

हितेश भांडिया को ‘युवा गौरव’ व संजय सुराणा को ‘महाप्रज्ञ प्रतिभा पुरस्कार’

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी, युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमण जी की मुख्य उपस्थिति में आज मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन हुआ। आज भाद्रपद शुक्ला पूर्णिमा के पावन अवसर पर पूज्य प्रवर ने निर्धारित विषय ‘दो गुरुओं के गुरु कालूगणी’ को आगमिक दृष्टि से व्याख्यायित करते हुए धर्मसंघ के अष्टम शास्ता के ११७वें पदारोहण दिवस पर उनके ऐतिहासिक अवदान और धर्मसंघ की आचार्य परंपरा पर विस्तृत प्रकाश डाला।
कालूगणी का पदारोहण, अनूठा उत्तराधिकार व गुरु-शिष्य संबंध:
१. आचार्य परंपरा और सर्वोच्च स्थान: आचार्यश्री ने आगम का उद्धरण देते हुए फरमाया कि जिस प्रकार देवों के मध्य ‘इंद्र’ शोभायमान होते हैं, वैसे ही भिक्षुओं के बीच आचार्य शोभायमान होते हैं। हमारे धर्मसंघ की दृष्टि से देखें तो संघ में सर्वोपरि स्थान पर आचार्य होते हैं और सभी साधु-साध्वी उन्हीं के शिष्य होते हैं। साधु-साध्वियों के बिहार और चातुर्मास का निर्णय करना आचार्य का अपना मौलिक अधिकार है, इसीलिए साधु-साध्वी अपने चातुर्मास के स्थान की दृष्टि से सदैव निश्चिंत रहते हैं।
२. लाडनूँ का ऐतिहासिक पदारोहण व प्रच्छन्न निर्णय : आचार्य परंपरा के क्रम में आचार्यश्री कालूगणी हमारे धर्मसंघ के अष्टम आचार्य हुए और उनका पदारोहण इसी लाडनूँ की धरा पर हुआ था। परम पूज्य डालगणी का वि. सं. १९६६ का चातुर्मास लाडनूँ में शुरू हुआ था। डालगणी के सामने शारीरिक परिस्थिति रही और उन्होंने अपने उत्तराधिकारी का निर्णय कर लिया, परंतु उसे प्रच्छन्न (गुप्त) रखा, प्रकट नहीं किया। उन्होंने संतों की सभा में भी फरमा दिया कि मैंने उत्तराधिकारी का निर्णय कर दिया है और हमारे साथ वाले ३५ ठाणों में से ही कोई उत्तराधिकारी होगा। ऐसा अभूतपूर्व निर्णय करने वाले वे तेरापंथ के एकमात्र आचार्य हैं।
३. दीक्षा, गुरु-कृपा और दो युगप्रधानों के गुरु : मुनि कालूजी छापर जीवन के ११वें वर्ष में आचार्यश्री मघवा के पास दीक्षित हुए और उन्हें लगभग ५ वर्षों का मघवागणी का सान्निध्य मिला। छोटी आयु में मुनि कालू मघवागणी के आसपास ही अधिक रहते और अपना प्रतिलेखन-प्रतिक्रमण भी उन्हीं के पास करते। मुनि कालू को मघवागणी का विशेष कृपा-प्रसाद मिला, जिससे उनका संस्कृत भाषा व व्याख्यान क्षेत्र में विशेष विकास हुआ। उनके जीवन में आचार्यश्री मघवागणी, मातु श्री छोगांजी तथा मुनिश्री मगनलालजी स्वामी का विशेष प्रभाव रहा। पूज्यश्री ने फरमाया कि 'मेरे जीवन में दो धर्मगुरु हुए—परम पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री तुलसी और परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञजी। आचार्यश्री कालूगणी इन दोनों धर्मगुरुओं के भी गुरु थे।' उनका आचार्यकाल लगभग २७ वर्षों का रहा। पूज्यश्री ने कालूगणी की दीक्षा शताब्दी पर रचित गीतिका का सस्वर संघगान कराया।
बीदासर में मुमुक्षु लकित सेठिया की दीक्षा की ऐतिहासिक घोषणा:
१. मुमुक्षु की भावभरी अर्जी : मंगल प्रवचन के उपरांत मुमुक्षु लकित सेठिया ने आचार्यप्रवर के समक्ष उपस्थित होकर संयम पथ को अंगीकार करने की अपनी तीव्र आध्यात्मिक भावना निवेदित की।
२. बीदासर में दीक्षा की तिथि घोषित : आचार्यश्री ने महती कृपा फरमाते हुए घोषणा की कि मुमुक्षु लकित को यथासंभव बीदासर सुदी दूज, शुक्रवार ११ दिसम्बर २०२६ को सुधर्मा सभा में दीक्षा देने का भाव है। पूज्यप्रवर की इस पावन घोषणा के साथ ही पूरा समवसरण पंडाल जयघोष से गुंजायमान हो उठा।
अलंकरण व प्रतिभा पुरस्कार : कार्यक्रम में अ.भा.ते.यु.प. द्वारा वर्ष २०२६ का ‘युवा गौरव’ अलंकरण हितेश भांडिया को तथा ‘आचार्य महाप्रज्ञ प्रतिभा पुरस्कार’ संजय सुराणा को प्रदान किया गया। निवर्तमान अध्यक्ष रमेश डागा ने ‘युवा गौरव’ तथा उपाध्यक्ष द्वितीय अभिनंदन नाहटा ने ‘प्रतिभा पुरस्कार’ के प्रशस्ति पत्र का वाचन किया। पुरस्कृत व्यक्तित्वों ने पूज्यश्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
अधिवेशन का शुभारंभ व शपथ : पूज्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद् (अ.भा.ते.यु.प.) के ६०वें अधिवेशन का शुभारंभ हुआ। राष्ट्रीय अध्यक्ष पवन मण्डोत व महामंत्री सौरभ पटावरी ने अपने विचार व्यक्त किए और राष्ट्रीय अध्यक्ष ने नवीन पदाधिकारियों को शपथ दिलाई।

पूज्य प्रवर के मुखारविंद से: कालूप्रभु के पादाम्बुजों में भावपूर्ण स्वर-अर्चन

कालूप्रभु-पादाम्बुज अर्पित भावभीनी वंदना।
म्हारै मनड़े में उमड़े भक्ति-विभूषित स्पंदना॥
डालिम गणिवर परख निकाल्यो शासन रत्न अमोलो।
चमक्या तेरापंथ अम्बर में ज्यूं शारद चन्दना॥१॥
संस्कृत भाषा ऊंची जैनागम-कुंची कहलाई।
मघवा गुरुवर री सीख पाई हृदय-स्पर्शना॥२॥
आचारी ऋजु सन्तां ऊपर वत्सलता बरसाता।
करता उच्छृंखल वृत्तियां पर समुचित तर्जना॥३॥
तुलसी, महाप्रज्ञ आचारज देन थांरी संघ ने।
दो-दो युगप्रधान वरदान खातिर गण-अभिवंदना॥४॥
तिलक-शताब्दी जैन वि.भा. परिसर में आज मनावां।
शिखरारोहण कर पावां महाश्रमण शुभ व्यंजना॥५॥
लय : वन में देख्या है दोय वनवासी...
संदर्भ : आचार्य कालूगणी पदारोहण शताब्दी

'ऊपर से भी देखूँगा कि काम कैसे हो रहा है...'
(पूज्य आचार्य प्रवर ने सुनाया आचार्य तुलसी का अद्भुत संस्मरण!)

तेरापंथ धर्म संघ की पावन गुरु-शिष्य परंपरा और अपने पूर्वाचार्यों के प्रति परम कृतज्ञता व्यक्त करते हुए पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने अपने उत्तराधिकार और पूज्य गुरुदेवों के असीम वात्सल्य के ऐतिहासिक व भावुक प्रसंग साझा किए।
युगप्रधान आचार्य तुलसी का दूरदर्शी दृष्टिकोण:
१. इतिहास की अद्वितीय घटना: पूज्य आचार्य श्री ने फरमाया कि आचार्य तुलसी का चिंतन कितना दूरदर्शी था कि उन्होंने अपने जीवनकाल में ही न केवल अपने उत्तराधिकारी आचार्य महाप्रज्ञ जी को देखा, बल्कि भविष्य की सुदृढ़ व्यवस्था हेतु उन्हें (आचार्य महाश्रमण जी को) भी युवाचार्य पद के रूप में अपना पावन आशीर्वाद प्रदान किया।
२. लिखित उत्तराधिकार पत्र और 'पोते' को आशीर्वाद : 'भिक्षु विहार' के ऐतिहासिक प्रसंग को याद करते हुए पूज्य प्रवर ने बताया कि पूज्य तुलसी ने अपनी विद्यमानता में ही उन्हें उत्तराधिकार का पत्र दिखाया और आध्यात्मिक 'पोते' को युवाचार्य रूप में देखकर अपार स्नेह बरसाया। उन्होंने सहज भाव से फरमाया था— 'मैं ऊपर से भी देखूँगा कि काम कैसे हो रहा है।'
आचार्य महाप्रज्ञ जी का वात्सल्य और उदारता:
१. कार्य करने का अवसर : पूज्य आचार्य श्री ने आचार्य महाप्रज्ञ जी के सानिध्य में बिताए पलों को भावपूर्ण रूप से याद करते हुए कहा कि गुरुदेव महाप्रज्ञ जी ने युवाचार्य काल में उन्हें कार्य करने के पूरे अवसर दिए और सदैव उदारता से प्रेरित किया।
२. असीम कृपा का प्रसंग : यात्रा के दौरान आचार्य महाप्रज्ञ जी के वात्सल्यपूर्ण उद्गार को स्मरण करते हुए पूज्य श्री ने फरमाया कि गुरुदेव कहा करते थे— 'यात्रा तो महाश्रमण की है, मैं तो बस सहयोग कर रहा हूँ।' यह कथन शिष्य के प्रति उनके अनन्य वात्सल्य और उदार हृदय का अनुपम उदाहरण है।
सार संदेश : पूर्वाचार्यों के प्रति अटूट निष्ठा और समर्पण ही संघ की वास्तविक शक्ति है; आचार्य तुलसी की दूरदर्शिता और आचार्य महाप्रज्ञ जी के वात्सल्य की उसी पावन धारा पर आज तेरापंथ धर्म संघ निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर है।