साधनों में संयम और भाषा में विवेक ही आत्मा का कल्याण’ : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 27 सितम्बर, 2026

साधनों में संयम और भाषा में विवेक ही आत्मा का कल्याण’ : आचार्यश्री महाश्रमण

योगक्षेम वर्ष के दौरान जन-जन को आध्यात्मिक आलोक से प्रदीप्त कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की मुख्य उपस्थिति में आज मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन हुआ। आज के निर्धारित विषय ‘उपधि-प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा’ पर पूज्यप्रवर ने चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए साधु व गृहस्थ जीवन में उपकरणों और इच्छाओं के परिसीमन का मार्ग दिखाया।
उपधि-प्रत्याख्यान, अल्पोपाधि और जीवन का लाघव–
१. उपकरण और परंपरा का संतुलन : पूज्यश्री ने फरमाया कि चाहे साधु का जीवन हो या गृहस्थ का, जीवन संचालन के लिए वस्त्र, पात्र, आसन आदि उपकरणों की आवश्यकता होती है। साधु समुदाय में सांबर (वस्त्र सहित) और निरंबर (वस्त्र रहित) दो धाराएं हैं। हमारी श्वेतांबर परंपरा में वस्त्र रखना मान्य है। हम सोपाधिक हैं, परंतु अल्पोपाधि रहना ही मध्यम मार्ग और सच्ची साधना है।
२. योगक्षेम वर्ष में स्व-निरीक्षण का संदेश : आचार्यश्री ने साधु-साध्वी और समणी समुदाय के उपकरणों (मूल उपकरण, पारिहार्य वस्तुएं, औषधि थैला) के अल्पीकरण पर जोर देते हुए फरमाया कि योगक्षेम वर्ष के दौरान सभी चारित्रात्माएं स्वयं से स्वयं का निरीक्षण कर अल्पोपाधि बनें। जो वस्तुएं पास में हैं, उन्हें ज्यादा से ज्यादा उपयोग में लाएं। इससे जीवन में लाघव (हल्कापन) आता है और अनावश्यक बोझ कम होता है।
३. शब्द, कषाय और आहार की ऊनोदरी : पूज्यप्रवर ने गहन मार्गदर्शन देते हुए कहा कि साधु केवल बाहर से ही नहीं, बल्कि शब्दों का भी अल्प प्रयोग करे। अवसर होने पर भाषण की भी ऊनोदरी कर देनी चाहिए। इसके साथ ही कषाय—क्रोध, मान, माया, लोभ की अल्पता और खान-पान में अनासक्ति अनिवार्य है।
४. गृहस्थों के लिए १२ व्रतों की साधना: गृहस्थों को भी अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह न कर अपनी इच्छाओं का सीमाकरण करना चाहिए। व्यक्तिगत जीवन में भोगोपभोग का परिसीमन, ईमानदारी और पारदर्शिता आवश्यक है। १२ व्रतों और अणुव्रतों के संकल्पों से गृहस्थ की चेतना निर्मल रहती है।
नवदीक्षितों की बड़ी दीक्षा (छेदोप स्थापनीय चारित्र)–
१. पाँच महाव्रतों का रोपण : प्रवचन के उपरांत आज आचार्यश्री की पावन सन्निधि में सात दिवस पूर्व दीक्षित चारित्रात्माओं का छेदोपस्थापनीय चारित्र (बड़ी दीक्षा) का उपक्रम विधि-विधान से संपन्न हुआ।
२. आर्षवाणी और महाव्रत स्वीकारण : पूज्यश्री ने आर्षवाणी के पावन उच्चारण के साथ नवदीक्षितों को पाँच महाव्रतों का विस्तारपूर्वक तीन करण तीन योग से स्वीकारण कराया। तत्पश्चात नवदीक्षितों ने पूज्यश्री को विधिवत वंदना की।
तपस्या प्रत्याख्यान व 'लाडांजी की लाडली' पुस्तक लोकार्पण–
१. तपस्या का प्रत्याख्यान : मंगल प्रवचन के उपरांत साध्वी दीप्तियशा जी ने पूज्यप्रवर के समक्ष उपस्थित होकर १३ की तपस्या का प्रत्याख्यान (संकल्प) किया।
२. पुस्तक लोकार्पण व अभिव्यक्तियाँ : कार्यक्रम के दौरान साध्वी संचितयशा जी द्वारा लिखित एवं शासनश्री साध्वी सोमलता जी के जीवन वृत्त पर आधारित पुस्तक ‘लाडांजी की लाडली’ का जैन विश्वभारती के पदाधिकारियों द्वारा आचार्यश्री के समक्ष भावपूर्ण लोकार्पण किया गया। पूज्यश्री ने इस अवसर पर मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। साध्वी सोमलता जी के संसारपक्षीय भ्राता मुनिश्री कमलकुमार जी एवं साध्वी रक्षितयशा जी ने अपनी भावाभिव्यक्ति प्रस्तुत की।

Need पूरी होती है, पर Want नहीं!...

पूज्य प्रवर ने स्पष्ट किया कि अनियंत्रित इच्छाएँ ही मानसिक अशांति और अनैतिकता की मुख्य जड़ हैं।
१. 'नीड' (जरूरत) और 'वॉन्ट' (चाहत) में समझें अंतर : पूज्य प्रवर ने फ़रमाया कि व्यक्ति को जीवन में अपनी 'जरूरत' और 'चाहत' के सूक्ष्म अंतर को समझना अति-आवश्यक है। वर्तमान समय में मनुष्य अपनी वास्तविक आवश्यकताओं से कहीं अधिक भौतिक वस्तुओं की लालसा (वॉन्ट) पाल लेता है। जरूरतों की पूर्ति जीवन चलाती है, जबकि असीमित चाहतें मन पर अनावश्यक मानसिक बोझ और तनाव पैदा करती हैं।
२. उम्र बढ़ने के साथ परिग्रह का हो विसर्जन : आचार्य श्री ने ढलती उम्र में विवेकपूर्ण परिग्रह-सीमा पर विशेष बल दिया। उन्होंने फ़रमाया कि—
'जैसे-जैसे आयु बढ़ती है (जैसे 80-82 वर्ष की अवस्था), व्यक्ति को अपने अधिकारों, संपत्तियों और परिग्रह (स्वामित्व) का धीरे-धीरे विसर्जन करना चाहिए।'
अत्यधिक वस्तुओं या संपत्तियों पर मालिकाना हक बनाए रखने से चिंता, जिम्मेदारी और पारिवारिक तनाव बढ़ता है। समय रहते परिग्रह कम करने से अंतस में समता और शांति का प्रादुर्भाव होता है।
सरलता अपनाएँ, अनैतिकता से बचें
पूज्य गुरुदेव ने आगाह किया कि अत्यधिक संग्रह और संपत्ति का मोह व्यक्ति को कई बार असत्य व अनैतिकता के चक्रव्यूह में फँसा देता है। दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने और व्यावसायिक मामलों में कई बार व्यक्ति संग्रह के मोह-पाश में गलत रास्ते अपना लेता है। यदि जीवन में 'सरलता और प्रामाणिकता' होगी, तो व्यक्ति अनैतिक कार्यों से बचेगा और उसका मन निश्चिंत रहेगा।