‘सिरियारी में अनशन पूर्वक त्यागा तनु का भार, संयम-तप ही जीवन का सार’ : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 24 सितम्बर, 2026

‘सिरियारी में अनशन पूर्वक त्यागा तनु का भार, संयम-तप ही जीवन का सार’ : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आद्य अनुशास्ता, महामना आचार्य श्री भिक्षु का २२४वां चरमोत्सव सुधर्मा सभा में तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में अत्यंत भव्य एवं आध्यात्मिक रूप में समायोजित हुआ। इस अवसर पर चतुर्विध धर्मसंघ को अपना पावन संबोध प्रदान करते हुए महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने फ़रमाया कि आज भाद्रपद शुक्ला त्रयोदशी है। चार महीनों के चातुर्मास का लगभग पूर्वाद्ध संपन्न हो गया है, जिसमें पर्युषण और भगवती संवत्सरी का आयोजन हो चुका है। आज का दिन आचार्य भिक्षु के मानव जीवन का चरम दिन (महाप्रयाण दिवस) हुआ था।
आचार्य भिक्षु का विलक्षण आचार्यत्व और आत्मानुशासन–
१. स्वाभाविक और अनूठा आचार्यत्व : पूज्यश्री ने फरमाया कि जैन शासन में अनेक आचार्य हुए हैं और सबके सिद्धांतों, कार्यशैली तथा प्रकृति में अंतर रह सकता है। आचार्य भिक्षु सामान्य क्रम से हटकर आचार्य बने। वे किसी भी पूर्वाचार्य के उत्तराधिकारी नहीं थे और न ही किसी द्वारा मनोनीत थे। जिस प्रकार तीर्थंकर को कोई उत्तराधिकारी तीर्थंकर नहीं बनाता, उसी प्रकार आचार्य भिक्षु भी अपने ढंग से आचार्य पद पर स्वयं स्थापित हुए।
२. भावितात्मा अणगार का विशेष दर्जा : पूज्य प्रवर ने स्पष्ट फरमाया कि आचार्य में अपनी संपदाएं हों तो उनका आचार्यत्व और गरिमापूर्ण हो सकता है। आचार्य कोई भी बन जाए, परन्तु 'भावितात्मा अणगार' बनना सबसे विशेष बात होती है।
३. त्वरित निर्णय व निर्भीकता: आचार्य भिक्षु के जीवन में आचार के साथ-साथ तीक्ष्ण बुद्धिमत्ता का अद्भुत योग था। उनमें सही समय पर त्वरित निर्णय लेने की क्षमता और निर्भीकता थी। धर्मसंघ की स्थापना के मात्र १५ वर्ष में ही उन्होंने भारमल जी स्वामी को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। विरोधों के बीच भी वे असीम साहस और उच्च मनोबल के साथ आगे बढ़ते रहे।
सिरियारी का अंतिम चातुर्मास, संथारा और महाप्रयाण की ऐतिहासिक गाथा–
१. अंतिम चातुर्मास और निरोग काया : वि. सं. १८६० का चातुर्मास स्वामी जी ने ७७ वर्ष की आयु में श्रावक हुकमचंद जी के निवेदन पर सिरियारी में पक्की हाट के स्थान पर किया। ७७ वर्ष की आयु में भी उनका शरीर निरोग था, वे तेज चाल से चलते थे और श्रावण पूर्णिमा तक स्वयं गोचरी पधारते थे। अंतिम समय में भी वे शिष्यों को आवश्यक सूत्र लिख-लिखकर समझाते थे।
२. मृत्यु से पूरी तरह निर्भीक : पर्युषण में भाद्रपद शुक्ला चतुर्थी को आयुष्य पूर्ण होने का आभास होने पर भी वे मृत्यु से निष्कंप व निर्भीक रहे। भाद्रपद शुक्ला एकादशी को आहार का त्याग किया और द्वादशी को कच्ची हाट से पक्की हाट पधारकर सिद्ध भगवान को नमोत्थुणं के पाठ से वंदन कर ऊंचे स्वर में यावज्जीवन के लिए अनशन (संथारा) स्वीकार कर लिया।
३. त्रयोदशी को पावन महाप्रयाण : आज ही की तिथि भाद्रपद शुक्ला त्रयोदशी को अनशन की परम पावन स्थिति में उनका महाप्रयाण हुआ। पूज्यश्री ने इसे अत्यंत उच्च आध्यात्मिक उपलब्धि बताते हुए स्वयं द्वारा रचित भिक्षु-गीत का ओजस्वी संघगान कराया।
साहित्य लोकार्पण, भावांजलि और मंचीय गरिमा–
१. ‘द स्टोरीज ऑफ आचार्य भिक्षु’ का लोकार्पण : जयाचार्य द्वारा रचित प्रसिद्ध कृति 'भिक्षु दृष्टांत' का मुनि ध्यानमूर्ति जी द्वारा किया गया अंग्रेजी अनुवाद ‘द स्टोरीज ऑफ आचार्य भिक्षु’ पुस्तक का लोकार्पण जैन विश्व भारती के पदाधिकारियों द्वारा पूज्यश्री के कर-कमलों में किया गया। आचार्यश्री ने इस संदर्भ में मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
चतुर्विध धर्मसंघ का संघगान : कार्यक्रम के अंत में आचार्यश्री स्वयं पट्ट से नीचे पधारे और संपूर्ण चतुर्विध धर्मसंघ ने अपने आराध्य के सम्मान में खड़े होकर ओजस्वी संघगान किया।

'150 साल पुराना पेड़ और ऊंचाई सिर्फ 2 फीट...'

किसी वृक्ष या धर्म संघ की वास्तविक ऊँचाई किस पर निर्भर करती है? साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी ने स्वामी रामतीर्थ की जापान यात्रा का एक अत्यंत मार्मिक दृष्टांत साझा करते हुए तेरापंथ धर्म संघ की नीव और वर्तमान शासन प्रभावना पर सारगर्भित उद्बोधन प्रदान किया।
स्वामी रामतीर्थ और जापानी माली का दृष्टांत :
१. बौने वृक्षों का रहस्य : स्वामी रामतीर्थ जब जापान गए, तो उन्होंने एक राजा के बगीचे में 150-200 वर्ष पुराने वृक्ष देखे, जिनकी ऊँचाई मात्र 1-2 फीट थी।
२. जड़ों का काटना : माली ने स्वामी जी को बताया कि इन पेड़ों की जड़ों को बढ़ने नहीं दिया जाता और उन्हें लगातार काटा जाता है, जिससे इनका विकास रुक जाता है।
तेरापंथ धर्म संघ की नीव और आचार्य भिक्षु :
१. जड़ों की गहराई = संघ की ऊँचाई : साध्वीवर्या जी ने इस वैज्ञानिक सत्य को संघ से जोड़ते हुए फरमाया कि जैसे वृक्ष का विकास उसकी जड़ों की गहराई पर निर्भर करता है, वैसे ही तेरापंथ धर्म संघ की आज की गगनचुंबी सफलता के पीछे आद्य प्रवर्तक स्वामी भिक्षु द्वारा डाली गई कड़क और गहरी नीव है।
२. अनन्यातिशय योगदान: आचार्य भिक्षु ने त्याग, आचार और अनुशासन की जो गहरी जड़ें जमाईं, उसी के फलस्वरूप आज यह संघ संपूर्ण अध्यात्म जगत में विशाल वटवृक्ष की तरह खड़ा है।
वर्तमान शासनपति और साधना का सौभाग्य –आचार्य भिक्षु का प्रतिरूप:
साध्वीवर्या जी ने पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी को आचार्य भिक्षु का साक्षात प्रतिरूप बताते हुए कहा कि वर्तमान में उनके पावन शासन में साधना करना महासौभाग्य का विषय है।

'जन्मदिन केवल एक हिस्सा, महाप्रयाण पूरे जीवन का दर्पण...'

आचार्य भिक्षु के समग्र जीवन दर्शन और उनसे मिलने वाली प्रेरणाओं को रेखांकित करते हुए पूज्य साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभा जी ने संघ के सम्मुख अत्यंत प्रभावकारी एवं भावपूर्ण विचार व्यक्त किए।
जीवन का वास्तविक विश्लेषण (चरमोत्सव का महत्व)
१. समग्र व्यक्तित्व का दर्शन : साध्वी प्रमुखा जी ने स्पष्ट फरमाया कि जन्मदिन मनाना किसी के जीवन के केवल एक अंश का उत्सव होता है, जबकि 'महाप्रयाण' (चरमोत्सव) के दिन हमारे सामने उस महापुरुष का संपूर्ण जीवन और विराट व्यक्तित्व उभरकर आता है।
२. स्वामी भिक्षु के अलौकिक गुण : दिव्य गुणों का पुंज : उन्होंने आचार्य भिक्षु के जीवन को उद्यम (परिश्रम), साहस, शक्ति, बुद्धि और पराक्रम का अनुपम संगम बताया।
३. गुरु-चरणों में प्रार्थना और संघ-प्रभावना :
A. गुण-जागरण का संकल्प: साध्वी जी ने पूज्य आचार्य प्रवर (आचार्य श्री महाश्रमण जी) के चरणों में यह पावन याचना की कि आचार्य भिक्षु के ये पाँचों दिव्य गुण (उद्यम, शक्ति, बुद्धि, साहस और पराक्रम) पूरे धर्म संघ के प्रत्येक सदस्य में निरंतर जाग्रत रहें।
B. मार्ग पर अग्रसर रहने का संदेश : उन्होंने आह्वान किया कि आचार्य भिक्षु के आदर्शों को अपने जीवन में उतारकर हम सभी निशदिन तेरापंथ धर्म संघ की प्रभावना को नए शिखरों तक पहुँचाएँ।

224वें भिक्षु चरमोत्सव के उपलक्ष में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी द्वारा रचित गीत
श्रद्धायुत सविनय वन्दन बारम्बार।
गुरुवर भीखणजी स्वामी का जयकार।।
प्रभुवर के प्रति दृढ़ आस्था से टूटे अघ प्राकार।।
तात्विक ग्रन्थों के प्रणयन से खुला ज्ञान का द्वार।
अध्येताओं की खातिर यह विभुवर का उपहार।।1।।
स्वामीजी की जन्म शताब्दी हुई तीसरी पार।
तेरापथ में युवाचार्य का स्वप्न हुआ साकार।।2।।
सिरियारी में अनशनपूर्वक त्यागा तनु का भार।
संयम-तप से भावित होना नर जीवन का सार।।3।।
तेरह सन्तों की संयुति से संघ नींव तैयार।
वर्तमान में सप्तशताधिक वर सतियां अनगार।।4।।
शिक्षण चिन्तन-मन्थन-निर्णय-प्रवचन का व्यापार।
योगक्षेम करें गण का हो निर्मल ज्ञानाचार।।5।।
'महाश्रमण' जै.वि.भा. परिसर बना धर्म संसार।
भैक्षव शासन की शुभ सुषमा पाए प्रचुर प्रसार।।6।।
चरमोत्सव भिक्षु स्वामी का चन्देरी गुलजार।
प्रभुजी के प्रति प्रतिपल उमड़े आस्था-पारावार।।7।।
(लय – उपकारी गुरुवर ओ थारो उपकार...)

 

जब प्रिज्म से गुजरी आचार्य भिक्षु के जीवन की किरणें...

युवाचार्य प्रवर ने आचार्य भिक्षु के विराट व्यक्तित्व को समझाने के लिए एक वैज्ञानिक दृष्टांत का सहारा लिया। उन्होंने कहा कि जैसे एक प्रिज्म (Prism) से गुजरने पर प्रकाश अपनी विभिन्न किरणों (स्पेक्ट्रम) में विभाजित हो जाता है, वैसे ही आचार्य भिक्षु का जीवन एक प्रकाश पुंज की तरह है, जिसे सात आयामों के माध्यम से समझाया।
1. आत्मस्थ पुरुष : इसका अर्थ है 'भीतर का प्रकाश'। आचार्य भिक्षु ने दुनिया को बदलने से पहले स्वयं को साधा। उन्होंने अपने तन, मन और इंद्रियों पर पूर्ण नियंत्रण प्राप्त किया। उनकी पहचान बाहरी कार्यों से अधिक उनकी आंतरिक साधना से थी।
2. अवधूत पुरुष : 'अवधूत' का अर्थ है कर्मों को प्रकंपित करके आत्मा से अलग कर लेना। उन्होंने काम, क्रोध, लोभ जैसी दुष्प्रवृत्तियों का त्याग किया। वे अपने लक्ष्य (सत्य) के प्रति इतने समर्पित थे कि उन्होंने अपने प्राणों की भी परवाह नहीं की।
3. अभय पुरुष : इसका अर्थ है 'निर्भीकता का प्रकाश'। सत्य को पहचानना एक बात है और उसके पक्ष में अडिग रहना दूसरी। आचार्य भिक्षु ने विपरीत परिस्थितियों और कड़े संघर्षों के बीच भी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा और निडर होकर आगे बढ़ते रहे।
4. आचार पुरुष : उन्होंने साधना के लिए जीवन में शुद्ध आचार (आचरण) को आधार बनाया। उन्होंने सुख सुविधाओं का त्याग कर कठोर आचार संहिता का पालन किया और संघ को भी उसी मार्ग पर प्रेरित किया।
5. अनुशासन पुरुष : आचार्य भिक्षु ने धर्म संघ में एक सुदृढ़ आचार्य अनुशासन स्थापित किया। उनका मानना था कि वही व्यक्ति दूसरों को अनुशासित कर सकता है जिसने स्वयं को आत्मानुशासन में रखा हो।
6. आगम पुरुष : उनकी साधना और वाणी का मूल स्रोत 'आगम' (जैन शास्त्र) था। जैसे एक वृक्ष की शक्ति उसकी जड़ों में होती है, वैसे ही आचार्य भिक्षु की दृष्टि का आधार आगम वाणी थी।
7. आलोक पुरुष : यह 'भविष्य का प्रकाश' है। महापुरुषों का प्रभाव केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं रहता। आचार्य भिक्षु के सिद्धांत और दृष्टि आज भी आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्गदर्शक प्रकाश (आलोक) के रूप में कार्य कर रहे हैं।