गुरुवाणी/ केन्द्र
‘कषाय ही पुनर्जन्म का मूल, मन-वचन-काय को रखें इससे मुक्त’: आचार्यश्री महाश्रमण
सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के प्रेरक युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में चतुर्विध धर्मसंघ को सम्बोधित किया। पूज्यप्रवर ने उत्तरज्झयणाणि आगम के आलोक में ‘कषाय प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ विषय पर विस्तृत आगमिक व्याख्यान फरमाते हुए कषायों के त्याग, वीतरागता और परम सुख की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त किया।
आठ आत्माएँ, कषाय की मलिनता और पुनर्जन्म का मूल–
१. कषाय आत्मा त्याज्य व अशुद्ध : पूज्यश्री ने फरमाया कि आगम में आठ प्रकार की आत्माएँ बताई गई हैं—द्रव्य आत्मा, कषाय आत्मा, योग आत्मा, उपयोग आत्मा, ज्ञान आत्मा, दर्शन आत्मा, चारित्र आत्मा और वीर्य आत्मा। इन आठों में कषाय आत्मा त्याज्य, मलिन, अशुद्ध और परिहरणीय है। यह एक विजातीय तत्त्व है। कषाय आत्मा का पूरी तरह विनाश हुए बिना द्रव्य आत्मा कभी मोक्ष गति प्राप्त नहीं कर सकती।
२. कर्म मल और पुनर्जन्म का कारण : आत्मा के बार-बार जन्म-मरण करने और कर्म रूपी मल के आगमन का मुख्य कारण कषाय ही है। पूज्यश्री ने उदाहरण देते हुए फरमाया कि यदि पुनर्जन्म को एक विशाल वृक्ष मान लिया जाए, तो उसका मूल (जड़) कषाय तत्त्व है। अनियंत्रित क्रोध, अहंकार, बढ़ती हुई माया और लोभ—ये चारों कषाय ही पुनर्जन्म के वृक्ष की जड़ों को सींचते हैं, जिससे जीव निरंतर संसार चक्र में भटकता रहता है।
३. आस्रव व अशुभ योग का विवेक : आगमिक प्रश्न ‘कषाय प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ का समाधान करते हुए पूज्यश्री ने फरमाया कि कषाय दो रूपों में प्रकट होता है—एक आस्रव के रूप में और दूसरा अशुभ योग के रूप में। साधु व चारित्रात्माओं के जीवन में भी योग रूप कषाय का त्याग होता है। यदि साधु के मन, वचन और काय रूपी योग में क्रोध, मान, माया व लोभ आता है तो साधना में दोष लगता है। किंतु यदि योग के साथ कषाय न जुड़े तो चारित्र निर्मल रहता है।
४. योगों की शुद्धि व प्रायश्चित्त : साधुओं का निरंतर यह रुझान रहना चाहिए कि उनके मन, वचन और काय रूपी योगों में कषाय का प्रवेश न हो। यदि अनजाने में कोई दोष लग भी जाए, तो साधक को तुरंत प्रायश्चित्त ग्रहण कर स्वयं को शुद्ध कर लेना चाहिए।
५. कषाय त्याग का फल - वीतरागता व समत्व : पूज्यप्रवर ने फरमाया कि कषाय प्रत्याख्यान (त्याग) करने से जीव वीतराग भाव को प्राप्त होता है। जो वीतराग बन जाता है, वह सुख हो या दुख—सदैव समभाव में रहता है। समत्व की प्राप्ति से राग-द्वेष का विच्छेद हो जाता है और जीव को परम एवं असीम सुख की अनुभूति होती है।
तपस्या का प्रत्याख्यान व जैन विश्व भारती की ५५वीं साधारण सभा:
१. १५ दिन की तपस्या : कार्यक्रम के दौरान साध्वी भावनाप्रभा जी ने पूज्य आचार्यश्री के श्रीमुख से १५ दिन की तपस्या (पक्षखमण) का प्रत्याख्यान (संकल्प) ग्रहण किया।
२. ५५वीं वार्षिक साधारण सभा का शुभारंभ : पूज्य आचार्यश्री की पावन सन्निधि में जैन विश्व भारती की ५५वीं वार्षिक साधारण सभा का औपचारिक शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर संस्था के अध्यक्ष अमरचंद लुंकड़, मंत्री सलिल लोढ़ा तथा प्रधान न्यासी जयंतीलाल सुराणा ने अपनी भावाभिव्यक्ति प्रस्तुत की। कार्यक्रम का कुशल संचालन मंत्री श्री सलिल लोढ़ा ने किया।
३. युवाचार्य श्री का ओजस्वी बोध : युवाचार्य श्री महावीर कुमार जी ने अपने सम्बोधन में कहा कि जैन विश्व भारती पूरे विश्व स्तर पर जैन समाज का प्रतिनिधित्व करने वाली गौरवशाली संस्था है। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी ने इसे ‘कामधेनु’ जैसा गरिमामय संबोधन प्रदान किया था और वर्तमान अधिशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी ने इसे ‘जय कुंजर’ से उपमित किया है। उन्होंने संस्था के सभी आयामों में निरंतर प्रगति की मंगलकामना की।
पूज्यप्रवर का पावन मंगल आशीर्वाद:
अद्वितीय केंद्रीय संस्था : पूज्य आचार्यश्री ने अपने मंगल आशीर्वाद में फरमाया कि जैन विश्व भारती, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ समाज की एक अद्वितीय और महत्वपूर्ण केंद्रीय संस्था है। इसका परिसर अत्यंत विशाल है, जहाँ मुमुक्षुओं, समणियों और चारित्रात्माओं का निरंतर प्रवास बना रहता है। यहाँ बहुआयामी गतिविधियाँ संचालित होती हैं। पूज्यश्री ने संस्था की समस्त गतिविधियों के सुचारू व श्रेष्ठ संचालन हेतु अपना पावन आशीर्वाद प्रदान किया।