सक्षम देह से करें धर्म-सेवा, संथारे में जल्दबाज़ी न करें’: आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 28 सितम्बर, 2026

सक्षम देह से करें धर्म-सेवा, संथारे में जल्दबाज़ी न करें’: आचार्यश्री महाश्रमण

सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के प्रेरक युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की मुख्य उपस्थिति में आज मुख्य प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन हुआ। पूज्यप्रवर ने उत्तरज्झयणाणि आगम के माध्यम से आज के निर्धारित विषय ‘आहार प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा’ पर व्याख्यान फरमाते हुए चतुर्विध धर्मसंघ को आहार संयम, अनशन तथा संथारे के विवेक संबंधी गूढ़ मार्गदर्शन प्रदान किया।
आहार संयम, संथारा विवेक और कर्म निर्जरा का मार्ग–
१. जीवन में आहार और श्वास का संबंध : पूज्यश्री ने फरमाया कि श्वास के बिना तो व्यक्ति कुछ पल भी नहीं रह सकता, किंतु भोजन और पानी के बिना कई दिन निकाले जा सकते हैं। साधु को भी शरीर संचालन हेतु आहार-जल की अपेक्षा रहती है। अचित्त जल न मिलने पर तृषा (प्यास) और भोजन न मिलने पर क्षुधा (भूख) का परीषह सहना पड़ता है।
२. संथारे में जल्दबाज़ी न करने का आगमिक विवेक : पूज्यप्रवर ने संथारे (जीवनपर्यंत अनशन) के संदर्भ में आगमिक वाणी प्रस्तुत करते हुए फरमाया कि जब तक शरीर सक्षम है और उससे साधना व संघ-सेवा का लाभ मिल रहा है, तब तक संथारे में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। साधु सोचे कि जब तक वह विहार, उपदेश, रुग्ण संतों की सेवा और अध्ययन-अध्यापन कर सकता है, तब तक शरीर को आहार-पानी रूपी भाड़ा देकर इन पावन कार्यों में नियोजित रखे।
३. स्वास्थ्य के अनुकूल आहार व १४ नियमों की साधना : पूज्यश्री ने फरमाया कि उम्र और स्वास्थ्य के अनुकूल ही विवेकपूर्ण आहार ग्रहण करना चाहिए। आहार संयम में विगय-वर्जन तथा उपवास, तेला, अठाई, मासखमण अथवा कुछ घंटों के तिविहार/चौविहार के प्रयोग किए जा सकते हैं। गृहस्थों के लिए १४ नियमों की व्यवस्था संयम का सहज माध्यम है।
४. जीवन की अभिलाषा का विच्छेद : आगम का संदर्भ देते हुए पूज्यश्री ने फरमाया कि आहार का प्रत्याख्यान करने से जीव जीने की तृष्णा से मुक्त हो जाता है। साधक स्वाध्याय, सेवा, तप और ध्यान में से किसी एक योग को प्रधानता देकर कर्म निर्जरा करे और चित्त में सदैव समाधि रखे।
आचार्य महाप्रज्ञ जी की ३ प्रमुख कृतियों का लोकार्पण–
१. जैन विश्व भारती का उपक्रम: मंगल प्रवचन के उपरांत जैन विश्व भारती के पदाधिकारियों द्वारा परम पूज्य आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी द्वारा रचित ३ प्रमुख पुस्तकों का पूज्य आचार्यश्री के समक्ष भावपूर्ण लोकार्पण किया गया–
‘क्या हम जैन हैं?’
‘कैसे हो गुणों का विकास’
‘ज्ञान का सार आचार’
२. पूज्यश्री का मंगल आशीर्वाद : आचार्यप्रवर ने इन कृतियों के लोकार्पण पर संपूर्ण संघ और संस्था को अपना पावन मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
संदीप ललवानी को 'युवा व्यक्तित्व पुरस्कार' व भावाभिव्यक्ति–
१. राष्ट्रीय अलंकरण की घोषणा : अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिषद् (अ.भा.ते.यु.प.) द्वारा वर्ष २०२६ का ‘आचार्य महाश्रमण युवा व्यक्तित्व पुरस्कार’ संदीप ललवानी को प्रदान किया गया। अ.भा.ते.यु.प. अध्यक्ष पवन माण्डोत ने पुरस्कार की घोषणा की तथा महामंत्री सौरभ पटावरी ने प्रशस्ति पत्र का वाचन किया।
२. कृतज्ञता व मुनि श्री के विचार : ललवानी ने पुरस्कार ग्रहण कर पूज्यश्री के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की।
कार्यक्रम में मुनि योगेश कुमार जी ने भी अपने ओजस्वी विचार व्यक्त किए। पूज्यश्री ने सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।