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शांति संतोष सुख का आधार- क्षमा
चिकमगलुरु। युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वी पुण्ययशाजी ने क्षमापना दिवस पर क्षमा का महत्त्व बताते हुए अपने मंगल उद्बोधन में कहा — संवत्सरी महापर्व वैर-विरोध को भूलकर क्षमा करने का पर्व है। क्षमा वीरों का भूषण है।क्रोध के बाद पश्चाताप,थकान, ग्लानी के भाव आते हैं और क्षमा के बाद चित्त में शांति,संतोष व सुख की अनुभूति होती है।क्षमा का अर्थ है प्रतिक्रिया और प्रतिशोध के सिलसिले को रोक देना। साध्वी वर्धमान यशाजी ने जीवन की पोथी पढ़ने का यह सुन्दर अवसर आया है सुमधुर गीतिका का संगान किया। इस अवसर पर तेरापंथ सभा के अध्यक्ष महेन्द्र डोसी आदि उपस्थित रहे।मंच संचालन मदन गादिया ने किया।