आचार निष्ठा की महाज्योति-आचार्य भिक्षु

संस्थाएं

उधना।

आचार निष्ठा की महाज्योति-आचार्य भिक्षु

आचार्यश्री महाश्रमणजी की विदुषी सुशिष्या डॉ. साध्वी परमयशाजी के सानिध्य में '224वां भिक्षु चरमोत्सव' कार्यक्रम का समायोजन हुआ। डॉ. साध्वी परमयशाजी ने अपने उद्बोधन में कहा कि अतीन्द्रिय ज्ञान की अनुभूति ज्ञान लिए आए भिक्षु, समस्याओं का समुचित समाधान लिए आए भिक्षु, तारों के बीच चमकते चांद सम थे मेरे आराध्य, इस जहां में अपनी अलग पहचान लिए आए भिक्षु। नॉलेज के लिए कॉलेज में नहीं गए पर 38 हजार साहित्य का सृजन करके कीर्तिमान बना दिया। मर पूरा देस्या पर आत्मा रा कारज सारस्या - इस आस्वाश विश्वास के साथ वे आतापना लेते। 5 वर्ष तक आहार पानी स्थान पूरा नहीं मिला फिर भी भिक्षु स्वामी Be Positive, Be Attractive, Be Confident रहे। भिक्षु स्वामी ने जीवन के संध्याकाल में उच्चकोटि की आराधना की। उन्होंने संथारा ग्रहण किया। सबसे खमत - खामणा किया। संतों को शिक्षाएं प्रदान की - परस्पर हेत रखना, किसी में अवगुण मत देखना। अंतिम यात्रा में 108 गांवों के लोग शामिल हुए, 500 रु. की उस युग में उछाल हुयी। साध्वी कुमुदप्रभाजी ने 'भिक्षु अष्टकम्' के संगान से कार्यक्रम की शुरुआत की। साध्वी मुक्ताप्रभाजी ने उपस्थित श्रावक-श्राविकाओं से विभिन्न प्रश्नोत्तर पूछे जिसमें सभी ने हर्ष और उल्लास के साथ भाग लिया। साध्वी विनम्रयशाजी ने वक्तव्य के माध्यम से अपनी भावों की प्रस्तुति दी। भिक्षु चरमोत्सव पर तेरापंथ सभाध्यक्ष नेमीचंद पोरवाड़, तेयुप मंत्री कमलेश डांगी आदि सभी ने अपनी भावों की अभिव्यक्ति दी। कार्यक्रम का संचालन सभामंत्री पुखराज हिरण ने किया। कार्यक्रम का समापन 'संघ गान' से हुआ।