अलौकिक चेतना के धनी थे आचार्य भिक्षु

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उत्तर हावड़ा।

अलौकिक चेतना के धनी थे आचार्य भिक्षु

युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमार जी ठाणा-३ के सान्निध्य में आचार्य श्री भिक्षु का २२४वां चरमोत्सव कार्यक्रम उत्तर हावड़ा के जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा द्वारा योगक्षेम विहार में आयोजित हुआ। मुनि जिनेश कुमार जी ने कहा — जैन धर्म के प्रभावक आचार्यों में एक प्रभावक आचार्य हुए हैं - आचार्य भिक्षु। आचार्य भिक्षु ऊर्जा के महान स्रोत, आत्मोदय के उत्प्रेरक, सत्य के पुजारी, अलौकिक चेतना के धनी जैन परंपरा महान तेजस्वी संत व महापुरुष हुए हैं। वे समयज्ञ, उपायज्ञ, अनुशासन प्रिय, आत्मार्थी, वैरागी, आचार निष्ठ, ज्ञान पिपासु, जिज्ञासु, तितिक्षु थे। वे आगम वेत्ता, तत्ववेत्ता, विधिवेत्ता, आत्म वेत्ता थे, उनका ज्ञान वैभव अपार था। वे हर स्थिति में अपने आपको संतुलित रखते। उनके जीवन में अनेक उतार-चढ़ाव आए, संघर्ष आए, अभाव में जीए फिर भी उनके चेहरे पर प्रसन्नता का भाव रहता था। अंतिम समय में उन्होंने कहा था कि 'मेरे कोई कमी नहीं रही, मेरा लक्ष्य था वह पूर्ण करके जा रहा हूँ।' मुनि ने आगे कहा — आचार्य भिक्षु मणिधारी पुरुष थे, परिश्रमशील थे, साधना में सजग और उनकी वाणी हृदय को छूने वाली थी। उनका जन्म राजस्थान के मारवाड़ के केंटालिया ग्राम में हुआ। वे बचपन से ही प्रतिभासंपन्न थे। गाँव में पंच की भूमिका निभाते थे। वे क्रांतिकारी युगपुरुष थे। सत्य के खातिर उन्होंने अपने गुरु से भी संबंध विच्छेद कर दिया। उनका जीवन खुली पुस्तक के समान था। उन्होंने अपने शिष्यों की प्रशंसा करते हुए भारीमाल जी की आज्ञा में रहने का निर्देश दिया। अंत में सिरियारी में ७ प्रहर के अनशन में उनका महाप्रयाण हुआ। यह दिवस चरमोत्सव के रूप में मनाया जाता है, उनके जीवन से प्रेरणा लेकर अपने जीवन को निर्मल व पावन बनाएं। शुभारंभ तेरापंथ महिला मंडल के मंगलाचरण से हुआ। स्वागत वक्तव्य सभा के मंत्री विनीत कोठारी ने दिया। मुनि परमानंद जी ने कहा — आचार्य भिक्षु का व्यक्तित्व गंभीर व व्यावहारिक था। उन्होंने शिष्यों व समाज को शिक्षा व प्रतिबोध प्रदान किया। मुनि कुणाल कुमार जी ने सुमधुर गीत का संगान किया। कार्यक्रम का संचालन मुनि परमानंद ने किया।