बिना डिग्री के दार्शनिक, प्रबंधक और सुधारक थे आचार्य भिक्षु

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बिना डिग्री के दार्शनिक, प्रबंधक और सुधारक थे आचार्य भिक्षु

परम तपस्वी भगवान महावीर की यशस्वी परंपरा के महासूर्य आचार्य भिक्षु के 224 वें चरमोत्सव का चेम्बूर तेरापंथ भवन में भव्य आयोजन किया गया। महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की विदुषी सुशिष्या साध्वी निर्वाणश्रीजी ने चरमोत्सव के संदर्भ में उद्गार व्यक्त करते हुए कहा - आचार्य भिक्षु ने साधना की धुनी रमाई। उन्होंने सुविधाओं से मुख मोड़ कर तप की राह चुनी। पांच-पांच वर्ष तक पूरा आहार नहीं मिला, पर वे विषयासक्ति से उपरत रहकर तपस्या में रमण करते रहे। उनकी आत्मा में प्रगाढ़ आस्था थी। वे देह में रहकर भी देहातीत अवस्था में जीने के अभ्यस्त थे। सच्चा साधक साधनों की परवाह नहीं करता। प्रबुद्ध साध्वी डा. योगक्षेमप्रभाजी ने अपने प्रखर वक्तव्य में कहा - आचार्य भिक्षु आचार शुद्धि के विधायक कुशल धर्मगुरु थे तो संघ व्यवस्था में प्रवीण थे। बिना किसी डिग्री के वे एक दार्शनिक, समाज-सुधारक, मनोवैज्ञानिक एवं कुशल प्रबंधक थे। साध्वी लावण्यप्रभाजी ने आचार्य भिक्षु की जीवन-झांकी प्रस्तुत की। मंगलाचरण साध्वी कुंदनयशा जी ने किया। साध्वीवृंद ने समवेत स्वरों में 'आओ आओ भिक्षु आओ' गीत की भावपूर्ण प्रस्तुति दी। तेरापंथ सभा से अध्यक्ष लक्ष्मण कोठारी, तेजराजजी बंबोली, तेयुप से हिमांशु गन्ना व तेममं से पायल मांडोत ने अपने विचार प्रकट किए। मंच संचालन सभा के पूर्व अध्यक्ष रमेश धोक ने किया।