अडिग मनोबल, दृढ़ विश्वास के धनी महामना आचार्यश्री भिक्षु

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अडिग मनोबल, दृढ़ विश्वास के धनी महामना आचार्यश्री भिक्षु

जीवन में मजबूत मनोबल हो और जिसके लिए ‘असंभव’ शब्द का कोई स्थान न हो, वह क्या नहीं कर सकता? ऐसा विलक्षण व्यक्तित्व, जो परिषद् को हर दृष्टि से बांधे रखने तथा समाज के किसी भी कार्य को अकेले संभालने की क्षमता रखता हो, और जो गण को अध्यात्म के उच्च शिखर तक नेतृत्व प्रदान करने की सामर्थ्य रखता हो—ऐसी अनेक विलक्षण प्रतिभाओं से युक्त महामना आचार्य श्री भिक्षु ने सत्य, अहिंसा, एक गुरु, एक विधान, शुद्ध आगम-सम्मत आचार आदि की अलख जगाने के लिए अपने दृढ़ विश्वास और मजबूत मनोबल के बल पर कठिन-से-कठिन चुनौतियों का अकेले ही चट्टान की तरह अडिग रहकर सामना किया। विक्रम संवत् 1817 में चैत्र शुक्ला नवमी के पावन दिन उन्होंने स्थानकवासी सम्प्रदाय के गुरु रूघनाथ जी से अभिनिष्क्रमण किया। सत्य का पुजारी कभी किसी भी प्रकार के झंझावातों से नहीं डरता। महापुरुषों की यही कहानी होती है—उन्होंने जो चिंतन किया और जो ठान लिया, उसे अपने दृढ़ संकल्प के साथ पूरा करके दिखाया। उन्होंने अनुशासन की ऐसी मजबूत नींव रखी, जिस पर आज संघ की पताका शिखर पर लहरा रही है।