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भिक्षु को जानना नहीं, जीना है
युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि हिमांशु कुमार जी एवं मुनि हेमंत कुमार जी के पावन सान्निध्य में 224वां आचार्य श्री भिक्षु चरमोत्सव श्रद्धा, भक्ति एवं आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। कार्यक्रम का मुख्य भाव 'भिक्षु को मनाएं – भिक्षु में रम जाएं' रहा। इस अवसर पर मुनि हिमांशु कुमार जी एवं मुनि हेमंत कुमार जी ने अपने प्रेरणादायी प्रवचनों के माध्यम से आचार्य श्री भिक्षु के व्यक्तित्व, कृतित्व, गुणों, तप, त्याग, संयम एवं सिद्धांतों पर विस्तार से प्रकाश डाला। मुनि श्री ने बताया कि आचार्य श्री भिक्षु का जीवन केवल आध्यात्मिक साधना तक सीमित नहीं था, बल्कि वह सत्य के प्रति दृढ़ता, सिद्धांतों के प्रति अडिग निष्ठा और आत्मसंयम का अनुपम उदाहरण था। उन्होंने कठिन परिस्थितियों और अनेक चुनौतियों के बीच भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उनके जीवन में साधना और आचरण को विशेष महत्व प्राप्त था।
आचार्यश्री भिक्षु ने धर्म को केवल मान्यता या चर्चा का विषय न मानकर उसे व्यवहार एवं आचरण में उतारने वाली साधना के रूप में प्रस्तुत किया। उनका जीवन यह प्रेरणा देता है कि आत्मशुद्धि, संयम, तप और सत्यनिष्ठा के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन को आध्यात्मिक दिशा प्रदान कर सकता है। उन्होंने सभी को इस दिन उपवास, एकासन आदि संयम-साधना का यथासंभव पालन करने का प्रयास करने की प्रेरणा दी। साथ ही कम से कम एक घंटे 'ॐ भिक्षु, जय भिक्षु' का जाप करने का आह्वान किया। मुनि श्री ने कहा कि जाप, तप और संयम केवल धार्मिक क्रियाएं नहीं, बल्कि आत्मचिंतन एवं आत्मशुद्धि की दिशा में महत्वपूर्ण साधन हैं। उन्होंने श्रद्धालुओं को अपनी क्षमता के अनुसार इन साधनाओं को अपनाकर आचार्यश्री भिक्षु के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने की प्रेरणा दी। मुनि श्री की इस प्रेरणा से उपस्थित श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह एवं आध्यात्मिक भाव देखने को मिला। चरमोत्सव का दूसरा चरण रात्रि में 'एक शाम भिक्षु के नाम' कार्यक्रम के रूप में आयोजित किया गया। आचार्यश्री भिक्षु का जीवन आज भी तेरापंथ समाज के लिए संयम, साधना, अनुशासन और सिद्धांतों के प्रति दृढ़ रहने की प्रेरणा देता है। उनका जीवन संदेश देता है कि धर्म की सार्थकता उसके आचरण में है और आध्यात्मिक उन्नति के लिए आत्मसंयम एवं निरंतर साधना आवश्यक है। केसिंगा में आयोजित 224वें आचार्य श्री भिक्षु चरमोत्सव ने श्रद्धालुओं को भिक्षु स्वामी के जीवन एवं दर्शन से जुड़ने, उनके आदर्शों को आत्मसात करने तथा संयम एवं साधना के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।