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आचार्य भिक्षु का जीवन प्रखरता और आत्मबल की मिसाल
दिल्ली स्थित खिलौनी देवी धर्मशाला में तेरापंथ के आद्य प्रवर्तक आचार्य भिक्षु का 224वाँ निर्वाण दिवस बहुश्रुत मुनि उदित कुमारजी के पावन सान्निध्य में श्रद्धापूर्वक आयोजित किया गया। इस अवसर पर मुनि उदित कुमारजी ने आचार्य भिक्षु के बहुआयामी व्यक्तित्व को उजागर करते हुए कहा कि आचार्य भिक्षु का जीवन असाधारण प्रखरता, गहन साधना और दृढ़ आत्मबल का जीवन था। उनमें ऐसी प्रखर बुद्धिमत्ता थी, जिसने सत्य को केवल विचार के स्तर पर नहीं, बल्कि जीवन की कसौटी पर पहचानने की दृष्टि दी। इसी दृष्टि के साथ वे अपनी साधना के प्रति अत्यंत जागरूक रहे और आत्मानुशासन को जीवन का आधार बनाया। उनका स्वावलंबी व्यक्तित्व इस बात का प्रमाण था कि आत्मकल्याण की यात्रा में साधक को अपने पुरुषार्थ और आत्मबल पर खड़ा होना पड़ता है।
मुनिश्री ने कहा कि आचार्य भिक्षु की महानता केवल किसी नई आध्यात्मिक धारा के प्रवर्तन में नहीं थी, बल्कि उनके चिंतन, निर्णय और आचरण की एकरूपता में थी। उन्होंने सत्य को जीवन का सर्वोच्च मूल्य मानकर उसे निर्भीकता से जिया। परिस्थितियाँ कितनी ही प्रतिकूल क्यों न हों, उनके संकल्प में शिथिलता नहीं आई। यही कारण है कि उनका जीवन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि आज भी साधक के लिए आत्मजागरण, पुरुषार्थ और शुद्ध आचरण की जीवंत प्रेरणा बना हुआ है। कार्यक्रम का शुभारंभ नमस्कार महामंत्र के सामूहिक उच्चारण से हुआ। जैन श्वेताम्बर तेरापंथ महिला मंडल द्वारा मंगलाचरण प्रस्तुत किया गया। रात्रि में विशेष ‘भिक्षु स्वरांजलि’ का आयोजन होगा, जिसमें श्रद्धालुओं ने गीत, भजन एवं कविताओं के माध्यम से आचार्य भिक्षु के प्रति अपनी श्रद्धा और भावनाएँ अभिव्यक्त करेंगे।