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पर्युषण महापर्व में भक्ति, साधना और तप का महाकुंभ
परम पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी की असीम अनुकंपा से श्री जैन श्वेतांबर तेरापंथी सभा, बारडोली के तत्वावधान में धर्म-आराधना का महापर्व 'पर्युषण पर्व' एवं 'संवत्सरी' अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ संपन्न हुआ।
इस आध्यात्मिक अवसर पर निर्देशानुसार मुंबई से पधारे प्रवक्ता उपासक मनोहरलाल गोखरू एवं उपासक डॉ. सुंदर लाल इन्टोदीया के सहयोग में समूचा बारडोली समाज धर्ममय वातावरण में सराबोर रहा।
अखंड जप अनुष्ठान: आठों दिन निरंतर २४ घंटे 'अखंड नमस्कार महामंत्र' के जाप का मंगल आयोजन हुआ।
उपस्थिति की विशालता: क्षेत्र के १२५ परिवारों की सहभागिता रही। दैनिक प्रातःकालीन प्रवचनों में औसतन २२० एवं सायंकालीन प्रवचनों में १६० श्रद्धालुओं ने धर्मलाभ लिया। वही, दैनिक सायंकालीन प्रतिक्रमण में प्रतिदिन औसतन ३५० से अधिक श्रावक-श्राविकाओं ने भाग लिया।
संवत्सरी महापर्व: आत्मशोधन और क्षमापना
महापर्व संवत्सरी के मुख्य दिवस पर समाज का अद्भुत उत्साह देखने को मिला। प्रातः प्रवचन में लगभग ४०० तथा सांवत्सरिक प्रतिक्रमण में ५३० से अधिक श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर संवत्सरी प्रतिक्रमण किया एवं वर्षभर के जाने-अनजाने हुए अपराधों के लिए 'मिच्छामि दुक्कड़ं' का आदान-प्रदान किया।
उपासक द्वय के प्रेरणादायी पाथेय से प्रेरित होकर श्रावक-श्राविकाओं ने अभूतपूर्व तप-साधना का परिचय दिया:
कुल उपवास की संख्या: पर्युषण काल में लगभग ६५० उपवास दर्ज किए गए।
लघु एवं दीर्घ तपस्या: बेले से चोले तक के १७ तप, ५ से अठाई (८ उपवास) तक की ६ तपस्याएँ तथा अठाई से अधिक की ४ दीर्घ तपस्याएँ प्रारंभ हुईं।
पौषध व्रत की साधना: संवत्सरी के पावन दिन २२ श्रावकों ने अष्टप्रहरी, ८ श्रावकों ने छह-प्रहरी एवं ५१ श्रावकों ने चतुष्प्रहरी पौषध व्रत का पालन कर संयम जीवन जीया।
संयम का पथ: विशेष रूप से प्रेरित होकर २० धर्मानुरागी श्रावकों ने 'बारह व्रती श्रावक' बनने का संकल्प स्वीकार किया।