‘हर सत्य बोलना अपेक्षित नहीं, निरवद्य वचन ही श्रेष्ठ’ : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 25 सितम्बर, 2026

‘हर सत्य बोलना अपेक्षित नहीं, निरवद्य वचन ही श्रेष्ठ’ : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, तीर्थंकर के प्रतिनिधि, अखण्ड परिव्राजक, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम का आयोजन हुआ। इस अवसर पर पूज्य प्रवर ने ‘वाक् संयम’ (अनुशासन पर्व) विषय को आगम के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ को पावन प्रेरणा प्रदान की। आचार्यश्री ने स्पष्ट फरमाया कि साधु की चर्या में वाक् गुप्ति का नियम होता ही है, परंतु सामान्य व्यक्ति के लिए भी वाणी का विवेक और संयम उसकी आत्मा को अहित से बचाने वाला और परम हित करने वाला सिद्ध होता है।
वाक् संयम और आगमिक भाषा का विवेक–
१. व्यवहार और भाषा का गणित : आचार्यश्री ने फरमाया कि बोलना हमारे जीवन की एक सहज प्रवृत्ति है और व्यवहार का सक्षम माध्यम भाषा है। भाषा सत्य, मृषा (असत्य), और सत्य-मृषा (मिश्रित) होती है। साधु को मृषा और सत्य-मृषा भाषा से विशेष रूप से बचना चाहिए।
२. सत्य भाषा में भी विवेक आवश्यक : पूज्यश्री ने गंभीर मार्गदर्शन देते हुए कहा कि साधु सत्य भाषा और व्यवहार भाषा का प्रयोग कर सकता है, पर इनमें भी गहरा विवेक अपेक्षित है। हर सत्य बात बोलना साधक के लिए उचित नहीं होता। जो सत्य दूसरों का अहित करने वाला या हिंसाकारक हो, उस सत्य से भी बचना चाहिए।
३. निरवद्य वचन ही श्रेष्ठ : आगम के आलोक में पूज्यप्रवर ने फरमाया कि सत्य वचनों में भी निरवद्य (दोषरहित) वचन ही श्रेष्ठ हैं। किसी की निंदा, बदनामी या दुर्भावनापूर्वक सत्य बातें बताना भी पूरी तरह वर्जनीय है। मन, वचन और काया से ऐसी कोई चेष्टा नहीं होनी चाहिए जो हिंसाकारक हो।
चतुर्दशी हाजिरी, लेखपत्र वाचन :
१. लेखपत्र का सस्वर उच्चारण : भाद्रपद शुक्ला चतुर्दशी के संदर्भ में आचार्यश्री ने हाजिरी का क्रम संपादित कराया। पूज्यश्री की अनुज्ञा से साध्वी पद्मप्रभा जी, साध्वी सुपार्श्वप्रभा जी, साध्वी ओमप्रभा जी, साध्वी कोमलप्रभा जी, साध्वी परमार्थप्रभा जी एवं साध्वी अर्चनाप्रभा जी ने लेखपत्र का उच्चारण किया।
‘जैन रामायण’ वाचन की घोषणा : कार्यक्रम के दौरान आचार्यश्री ने युवाचार्य श्री महावीरकुमार जी द्वारा ‘जैन रामायण’ का वाचन प्रारंभ किए जाने की महत्वपूर्ण घोषणा की। साध्वी प्रेमलता जी एवं सहवर्ती साध्वियों ने गीतिका की ओजस्वी प्रस्तुति दी, जिस पर पूज्यश्री ने मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
'वंदे मातरम' के १५० वर्ष व विद्या भारती को आशीर्वाद–
१. राष्ट्रगीत की भव्य प्रस्तुति: कार्यक्रम में विद्या भारती स्कूल की छात्राओं द्वारा राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ की सुमधुर प्रस्तुति दी गई।
२. नैतिकता व आध्यात्मिकता का संदेश : इस अवसर पर पूज्यश्री ने फरमाया कि 'वंदे मातरम' के १५० वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में यह सुंदर आयोजन हुआ है।
भारत में भौतिक और आर्थिक विकास के साथ-साथ आध्यात्मिकता और नैतिकता के मूल्य भी निरंतर पुष्ट होते रहने चाहिए। विद्या भारती के पास शिक्षा जगत का बड़ा बल है, वह भावी पीढ़ी में नैतिकता और अहिंसा के अच्छे संस्कार भरने का कार्य निरंतर करती रहे—यही मंगलकामना।