क्या, कितना और कैसा आहार करना है, इसका विवेक जरूरी

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विलेपार्ले मुम्बई

क्या, कितना और कैसा आहार करना है, इसका विवेक जरूरी

युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की सुशिष्या साध्वी राकेश कुमारी जी आदि ठाणा ४ के सान्निध्य में आयोजित इस विशेष कार्यक्रम में सांताक्रूज़, विलेपार्ले, अंधेरी, बांद्रा एवं खार क्षेत्रों से विशाल जनमेंदनी उपस्थित रही। कार्यक्रम का शुभारंभ साध्वी श्री जी के मंगल नवकार मंत्रोच्चार से हुआ। साध्वी चेतस्वी प्रभा जी ने खाद्य संयम विषय पर जानकारी प्रदान करते हुए आहार में संयम एवं विवेक की आवश्यकता को रेखांकित किया। कार्यक्रम का कुशल संचालन साध्वी मलय विभाजी द्वारा किया गया। साध्वी राकेश कुमारी जी ने उपस्थित जनमेदनी को संबोधित करते हुए कहा कि 'आज जैनियों के महापर्व पर्युषण का प्रथम दिवस है। यह भीतर की बंद खिड़कियों को खोलने का समय है। इन आठ दिनों में अप्रमत्त बनकर जीवन के अनमोल क्षणों को आत्म आराधना से जोड़ना है। खाद्य संयम की चर्चा करते हुए साध्वी श्री जी ने कहा कि वर्तमान परिवेश में आहार के प्रति नॉलेज के साथ विवेक होना अत्यंत आवश्यक है। क्या, कितना और कैसा आहार करना है—इसका विवेक जीवन के लिए महत्वपूर्ण है। असंयमित एवं कुपोषित आहार का शरीर के विभिन्न अंगों पर दुष्प्रभाव पड़ सकता है। उन्होंने उदाहरणों के माध्यम से किडनी, गुर्दे, लीवर, फेफड़ों, आमाशय, रक्त, उच्च रक्तचाप सहित मन एवं मस्तिष्क पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को समझाया। साध्वी श्री जी ने कहा कि शांति, समता, संतोष एवं संयमित आहार व्यक्ति के जीवन को प्राणवान बनाते हैं तथा दीर्घजीविता की ओर ले जाते हैं। संयमित आहार से मन, वचन एवं काया की त्रिगुप्ति में सहायता मिलती है और भावों की पवित्रता बनी रहती है। कार्यक्रम की संपन्नता से पूर्व साध्वी मलयविभा जी ने पर्युषण प्रवचन से संबंधित अत्यंत रोचक प्रश्नोत्तर करवाए। प्रश्नोत्तर की इस अनूठी प्रस्तुति ने पूरे वातावरण को जीवंत बना दिया और उपस्थित जनमेदनी को यह प्रेरणा मिली कि प्रवचन केवल सुनना ही नहीं, बल्कि उसे एकाग्रता एवं सजगता से आत्मसात करना भी आवश्यक है। कार्यक्रम का कुशल संचालन साध्वी मलयविभा जी ने किया।