पर्युषण बना आत्मजागरण का महोत्सव

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केसिंगा।

पर्युषण बना आत्मजागरण का महोत्सव

जैन श्वेतांबर तेरापंथ परंपरा के पावन पर्युषण महापर्व के अवसर पर स्थानीय तेरापंथ भवन, केसिंगा में नौ दिवसीय 'पर्युषण महापर्व आराधना' कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का पावन सान्निध्य युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि हिमांशु कुमार जी एवं मुनि हेमंत कुमार जी का प्राप्त हुआ। पर्युषण महापर्व जैन धर्म में आत्मावलोकन, संयम, तप, स्वाध्याय, ध्यान, जप, प्रतिक्रमण एवं आत्मशुद्धि की साधना का विशेष पर्व माना जाता है। इसी भावना को केंद्र में रखते हुए केसिंगा में नौ दिनों तक विभिन्न धार्मिक एवं आध्यात्मिक गतिविधियों का क्रमबद्ध आयोजन किया गया।
खाद्य संयम दिवस, स्वाध्याय दिवस, सामायिक दिवस, वाणी संयम दिवस, अणुव्रत चेतना दिवस, जप दिवस, ध्यान दिवस, भगवती संवत्सरी महापर्व एवं क्षमापना दिवस के माध्यम से साधकों को जीवन में संयम और आत्मनिरीक्षण के विभिन्न आयामों से जोड़ा गया। प्रतिदिन धार्मिक कार्यक्रमों की नियमितता बनी रही। संध्या समय सामूहिक प्रतिक्रमण का आयोजन हुआ, वहीं रात्रि में प्रवचन के माध्यम से मुनिश्री ने धर्म, संयम, आत्मचिंतन, कर्म सिद्धांत एवं जीवन में आध्यात्मिक चेतना के महत्व पर मार्गदर्शन प्रदान किया। श्रद्धालुओं ने नियमित रूप से इन कार्यक्रमों में सहभागिता कर पर्युषण की आराधना को जीवन से जोड़ने का प्रयास किया। पर्युषण के दौरान अनेक श्रावक-श्राविकाओं ने अपनी सामर्थ्य एवं श्रद्धा के अनुसार विभिन्न तपस्याओं का संकल्प लिया। कार्यक्रम के अंतर्गत उपवास, एकासन, बियासन, अठाई तथा अन्य तप-अनुष्ठानों में सहभागिता हुई। इसके साथ ही साधकों को क्रोध को शांत रखने, मौन साधना, प्रतिदिन सामायिक करने तथा नियमित रूप से तीनों समय प्रवचन सुनने जैसे संकल्पों के लिए प्रेरित किया गया। पर्युषण आराधना के दौरान अखंड जाप में सहभागिता रही। भगवती संवत्सरी पर विशेष धार्मिक आयोजन हुआ। इस दिन प्रातः 9:00 बजे से संध्या 4:15 बजे तक विस्तृत प्रवचन एवं आध्यात्मिक कार्यक्रम चला। मुनिश्री के सान्निध्य में संवत्सरी की आराधना, आत्मावलोकन एवं क्षमापना की भावना को विशेष रूप से अभिव्यक्त किया गया। संवत्सरी के अवसर पर लगभग 106 पौषध हुए, जो श्रद्धालुओं की आध्यात्मिक सहभागिता और तप-संयम के प्रति समर्पण को दर्शाता है। पूरे यह आयोजन पर्युषण महापर्व की मूल भावना 'आत्मा की ओर लौटना और स्वयं का परिष्कार करना' को सार्थक करता हुआ संपन्न हुआ।