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मौन से महामंत्र तक :मोक्ष की ओर बढ़ने का पाथेय
आठ दिवसीय साधना सत्र का कुशल मार्गदर्शन और आध्यात्मिक संचालन कोलकाता से पधारे ताराचंद बरमेचा एवं पंकज दुधोड़िया के पावन सानिध्य में हुआ। उनके ओजस्वी प्रवचनों, आगम सम्मत विवेचनों और प्रेरक शैली से संपूर्ण क्षेत्र धर्ममय रहा। पर्युषण काल के दौरान बेलडांगा समाज में त्याग और तपस्या की अविरल धारा बही। संवत्सरी पर्व की आराधना के दौरान 1 सात, 1 पंचौला, 2 चौला, 2 तेला, 4 बेला, 2 आयम्बिल एवं 4 एकासना की तपस्याएं हुईं। संवत्सरी महापर्व के पावन अवसर पर लगभग 87 श्रावक-श्राविकाओं ने उपवास का संकल्प धारण कर आत्म-साधना की। इस अवसर पर 5 आराधकों ने अष्टप्रहरी तथा 20 श्रावक-श्राविकाओं ने चतुष्टप्रहरी पौषध व्रत किया।
प्रातः एवं सायंकालीन प्रवचन सत्रों में उपासक-द्वय ने राग-द्वेष को क्षीण कर कर्म-निर्जरा करने तथा जीवन के अंतिम लक्ष्य 'मोक्ष' की ओर अग्रसर होने का व्यावहारिक पाथेय दिया। खाद्य संयम दिवस, स्वाध्याय दिवस, सामायिक दिवस, वाणी संयम दिवस, व्रत चेतना दिवस, जप दिवस एवं ध्यान दिवस पर सारगर्भित प्रकाश डाला गया। संवत्सरी महापर्व पर उपासक-द्वय ने भगवान महावीर स्वामी के 27 भवों का आगम आधारित मार्मिक चित्रण किया। मैत्री पर्व (क्षमापना दिवस) के मुख्य सत्र में उपासक-द्वय ने अंतर्मन के अहंकार व कषायों की गांठों को खोलकर समूचे चराचर जगत से क्षमा मांगने और क्षमा प्रदान करने की मार्मिक प्रेरणा दी। कार्यक्रम का कुशल व संचालन स्नेहा छाजेड़ ने किया।