‘विकट समय में बने जो आधार, डालिम गुरु को वंदन बारंबार ’: आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 23 सितम्बर, 2026

‘विकट समय में बने जो आधार, डालिम गुरु को वंदन बारंबार ’: आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि,युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में चतुर्विध धर्मसंघ को 'तेजस्वी आचार्य श्री डालगणी' विषय पर पावन पाथेय प्रदान किया।
अनुशासन और स्वाधर्म : अध्यात्म की आधारशिला –
१. आत्मानुशासन ही सच्चा अध्यात्म : आचार्यश्री ने फरमाया कि जीवन के परिष्कार और विकास के लिए अनुशासन एक उपाय
है और आत्मानुशासन अध्यात्म का एक गहरा तत्त्व है। अपने से अपना अनुशासन अध्यात्म की एक साधना है।
२. सर्वत्र अनुशासन का महत्त्व : चाहे राष्ट्र हो, विद्या संस्थान हो, धार्मिक संगठन हो या सामाजिक संस्था—अनुशासन का सर्वत्र महत्त्व है। राष्ट्र में यदि अनुशासन न हो, संविधान का पालन न हो और महत्त्वाकांक्षा ज्यादा हो, तो वहाँ अराजकता की स्थिति हो सकती है।
३. पात्रता का सूत्र : पूज्यश्री ने स्पष्ट फरमाया कि जो स्वयं पर अनुशासन नहीं रख सकता और दूसरों के अनुशासन में नहीं रह सकता, वह दूसरों पर भी अनुशासन करने के योग्य नहीं होता है। जो अच्छा शिष्य नहीं है, वह कभी अच्छा गुरु भी नहीं बन सकता।
तेजस्वी आचार्य डालगणी: ऐतिहासिक महत्त्व और विलक्षणताएँ–
१. लाडनूँ में महाप्रयाण की स्मृति : पूज्य प्रवर ने फरमाया कि आज भाद्रपद मास की शुक्ल पक्षीय द्वादशी है और जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के सप्तम अनुशास्ता परम पूजनीय आचार्य श्री डालगणी की महाप्रयाण तिथि है। विक्रम संवत १९८६ में इसी लाडनूँ में उनका चातुर्मास था और आज ही के दिन उनका महाप्रयाण हुआ था। आचार्य डालगणी हमारे धर्मसंघ में एक तेजस्वी आचार्य के रूप में ख्याति प्राप्त हैं। आदमी तेजस्वी के रूप में तभी उभरकर आता है जब उसमें कोई विशिष्टता होती है।
२. सर्वोपरि व्यक्तित्व और दायित्व : आचार्य श्री ने फरमाया कि हमारे धर्मसंघ में सामान्यतया आचार्य सर्वोपरि होते हैं। संगठन के बहुत सारे निर्णय जैसे विहार, चातुर्मास कहाँ कराना, साधु-साध्वियों को अग्रणी बनाना, साध्वी प्रमुखा की नियुक्ति व उत्तराधिकारी किसे बनाना आदि सारे कार्य आचार्य का अपना मौलिक अधिकार हैं।
३. राजस्थान से बाहर का अनूठा संबंध : आचार्य डालगणी उज्जैन नगरी से संबद्ध थे। हमारे धर्मसंघ के ११ आचार्य और ११वें आचार्य के युवाचार्य—इन सबको मिलाकर केवल एकमात्र आचार्य डालगणी ही राजस्थान से बाहर के अर्थात् उज्जयिनी नगरी से जुड़े हुए हैं। उनकी दीक्षा भी राजस्थान से बाहर इंदौर में हुई।
४. इतिहास के दो अद्भुत योगानुयोग : आचार्यश्री डालगणी के साथ मेरे दो संबंध जुड़ते हैं। प्रथम, डालगणी की दीक्षा भी एक मुनिजी द्वारा हुई— मुनिश्री हीरालाल जी स्वामी ने उन्हें दीक्षा प्रदान की, और मैं भी मुनिश्री सुमेरमल जी स्वामी (लाडनूँ) के द्वारा दीक्षित हूँ। तेरापंथ की परंपरा में आचार्य डालगणी और मैं दो ही ऐसे हैं जो मुनिश्री के द्वारा दीक्षित हैं।
५. विलक्षण इतिहास व तीन स्थल दर्शन : आचार्यश्री डालगणी हमारे धर्मसंघ के विलक्षण आचार्य थे। आचार्य सामान्यतया पूर्व आचार्य के द्वारा नियुक्त वर्तमान आचार्य होते हैं, परंतु डालगणी किसी भी पूर्व आचार्य श्री के द्वारा मनोनीत आचार्य नहीं थे। वे मुनिश्री के द्वारा घोषित आचार्य थे या धर्मसंघ द्वारा स्थापित आचार्य थे। वे मुनिश्री थे— मुनिश्री कालू जी स्वामी (रेलमगरा)। आज की तिथि में मैं डालगणी से जुड़े तीनों स्थानों— समाधि स्थल, साध्वियों के पुराने ठिकाणे (सेवा मंदिर) और आचार्य डालगणी के पदाभिषेक स्थल पर से होकर आया हूँ। वे धर्मसंघ को एक संकट काल में प्राप्त हुए थे। उन्होंने तीन प्रभावक यात्राएँ कच्छ क्षेत्र में कीं। उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के निर्णय को प्रकट नहीं किया, यह भी उनका एक विलक्षणत्व है। उन्होंने मुनिश्री कालूराम जी छापर को अपना उत्तराधिकारी बनाया जो हमारे गुरुओं आचार्यश्री तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी के भी गुरु थे।
अभातेममं का मंचीय उपक्रम:
१. महिला मंडल अधिवेशन का द्वितीय दिन : मंगल प्रवचन के उपरांत अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल के राष्ट्रीय अधिवेशन के दूसरे दिन भी आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में मंचीय उपक्रम हुआ। अ.भा.ते.म.मं. की मुख्य न्यासी कनक बरमेचा और राष्ट्रीय अध्यक्ष सुमन नाहटा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
२. आचार्यश्री द्वारा मंगल आशीर्वाद : पूज्य प्रवर ने फरमाया कि अधिवेशन से संभागियों को अच्छी खुराक मिले। अ.भा.ते.म.मं. समाज में महिलाओं की दृष्टि से प्रतिनिधि संस्था है। महिला मंडल द्वारा संचालित पाठ्यक्रम से अनेक साध्वियाँ जुड़ी हुई हैं। तत्त्व ज्ञान और तेरापंथ दर्शन अच्छा उपक्रम है। अ.भा.ते.म.मं. खूब अच्छा विकास करती रहे, इसे साध्वी प्रमुखा जी का मार्गदर्शन, निर्देशन मिलता रहे— यही मंगलकामना।

Career से आगे Culture का दायरा साध्वीप्रमुखा जी ने खोला Real Happiness का सीक्रेट

आधुनिक युग की आवश्यकताओं के साथ आध्यात्मिक मूल्यों का संतुलन कैसे बनाए रखा जाए? अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल की बहनों को संबोधित करते हुए पूज्य साध्वीप्रमुखा श्री जी ने शिक्षा, संस्कार और जीवन-विकास के अत्यंत महत्वपूर्ण पहलुओं पर मार्गदर्शन प्रदान किया।
शिक्षा, संस्कार और आधुनिकता का समन्वय :
१. शिक्षा की अनिवार्यता : साध्वी प्रमुखा जी ने स्पष्ट कहा कि वर्तमान युग में महिलाओं का शिक्षित होना अनिवार्य है। बिना शिक्षा के वे अपनी समस्याओं का सही समाधान नहीं खोज सकतीं।
२. संस्कारों की गहरी जड़ें : उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि शिक्षा के साथ संस्कारों की जड़ें भी गहरी होनी चाहिए। जिस प्रकार मजबूत जड़ों वाला वृक्ष हर तूफान को सह लेता है, उसी तरह सुसंस्कृत व्यक्ति जीवन की किसी भी चुनौती से विचलित नहीं होता।
३. आधुनिकता+अध्यात्म : जीवन में केवल आधुनिकता काफी नहीं है; जब तक उसमें आध्यात्मिकता का समावेश नहीं होगा, तब तक विकास का संतुलन अधूरा रहेगा।
'करियर ओरिएंटेड' बनाम 'कल्चर ओरिएंटेड':
१. मूल्यों को प्राथमिकता : साध्वी प्रमुखा जी ने नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करते हुए फरमाया कि केवल 'करियर ओरिएंटेड' (जॉब या व्यवसाय केंद्रित) बनना ही पर्याप्त नहीं है। जीवन में 'कल्चर' यानी नम्रता, शालीनता और सहिष्णुता के गुणों को प्राथमिकता देना अनिवार्य है।
२. सात्विक आनंद : करियर के साथ-साथ जब व्यक्ति संस्कारवान और कल्चर-ओरिएंटेड बनता है, तभी उसे जीवन में स्थायी और सात्विक आनंद की अनुभूति होती है।
पूज्य आचार्य महाप्रज्ञ जी का प्रेरक उदाहरण:
साध्वी प्रमुखा जी ने जीवन संतुलन को समझाने के लिए परम पूज्य आचार्य महाप्रज्ञ जी द्वारा दिए गए अत्यंत सरल व सटीक उदाहरण साझा किए:
दो हाथों की साम्यता: जैसे शरीर के दोनों हाथ बराबर हों तभी सुंदर और उपयोगी लगते हैं, वैसे ही जीवन में करियर और संस्कार का संतुलन होना चाहिए।

'एक ही तिथि और 5 महापुरुषों का इतिहास'...

पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने अपने पावन पाथेय में इस एक ही तिथि से जुड़ी संघ के 5 महान आचार्यों के जीवन की दुर्लभ और युगप्रवर्तक घटनाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।
भाद्रव शुक्ला द्वादशी : 5 आचार्यों के जीवन का अलौकिक संयोग
१. आचार्यश्री भिक्षु : इसी पावन तिथि पर संघ के आद्य प्रवर्तक स्वामी भिक्षु ने सिरियारी की पावन धरा पर अनशन (संथारा) ग्रहण किया था।
२. आचार्यश्री डालगणी : इसी तिथि को पूज्य डालगणी का महाप्रयाण (देवलोकगमन) हुआ था।
३. आचार्यश्री कालूगणी : डालगणी के महाप्रयाण के पश्चात, पूर्व-लिखित नाम के आधार पर आचार्य श्री कालूगणी का आचार्यत्व सहज रूप से सुनिश्चित हुआ।
४. आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी : इसी दिन आचार्य महाप्रज्ञ जी ने अपने उत्तराधिकारी के रूप में 'युवाचार्य महाश्रमण' के नाम की ऐतिहासिक घोषणा की
थी। आचार्य श्री ने इसे गुरु-दायित्व और 'ऋण से मुक्ति' की महत्वपूर्ण प्रक्रिया बताया।
५. आचार्यश्री महाश्रमण जी (स्वयं): इसी तिथि पर गंगाशहर में पूज्य आचार्य महाप्रज्ञ जी ने पूज्य प्रवर को 'अमल धवल चद्दर' (उत्तरीय) ओढ़ाकर विधिवत युवाचार्य पद प्रदान किया था।

बचपन का झूला, यौवन की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी !..

साध्वीप्रमुखा श्री विश्रुतविभाजी ने तेरापंथ धर्म संघ की मजबूती, इसके आध्यात्मिक आधारों और सदस्यों के कर्तव्यों पर सारगर्भित मार्गदर्शन प्रदान किया।
धर्म संघ के 4 मुख्य स्तंभ: साध्वीप्रमुखा जी ने तेरापंथ धर्म संघ की तुलना एक भव्य महल से करते हुए इसके चार मजबूत स्तंभ बताए:
श्रद्धा : संघ का सबसे पहला और मुख्य आधार।
सेवा : गुरु और संघ के प्रति निस्वार्थ सेवा-भाव।
समर्पण: धर्म के प्रति स्वयं का पूर्ण अर्पण।
विनम्रता : संघ की मर्यादा और संस्कारों का मूल प्रतीक। अहंकार का विसर्जन और संघ की शरण–
१. अहंभाव का त्याग : जब साधक अपने अहंकार और ममकार का विसर्जन करता है, तभी उसे संघ में सात्विक गौरव और प्राणवत्ता की अनुभूति होती है।
२. संघ ही सर्वस्व : स्वामी विवेकानंद के विचार और गुरुदेव श्री तुलसी के श्लोक 'संघ शरणं त्राणम्' का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संघ ही अनुयायियों के लिए बचपन का झूला, यौवन की फुलवारी और बुढ़ापे की काशी के समान सच्चा आधार है।
३. 'श्रद्धावान लभते ज्ञानम्' :
श्रीमद्भगवद्गीता के सिद्धांत को उद्धृत करते हुए साध्वी जी ने स्पष्ट किया कि बिना श्रद्धा और जिज्ञासा के सच्चा ज्ञान संभव नहीं है। संघ के सदस्यों के भीतर कूट-कूट कर भरी श्रद्धा ही उनकी वास्तविक सफलता की कुंजी है।
सार संदेश : अहंकार का विसर्जन, निस्वार्थ सेवा और कूट-कूट कर भरी श्रद्धा ही तेरापंथ धर्म संघ की अमरता और प्रत्येक सदस्य की आध्यात्मिक प्रगति का वास्तविक आधार है।

'जब पीएम मोदी ड्रेसिंग रूम पहुँचे'...

एक कुशल संगठन की नींव किस पर टिकी होती है? नेतृत्व, संवाद और कार्यकर्ताओं की क्षमता को कैसे सही दिशा दी जाए? इन महत्वपूर्ण प्रश्नों पर महिला मंडल अधिवेशन में साध्वीवर्या श्री संबुद्धयशा जी ने अपने प्रेरक वक्तव्य में विस्तार से प्रकाश डाला।
१. आदेश नहीं, संवाद: कुशल नेतृत्व का पहला मंत्र 'Telling' बनाम 'Talking' : साध्वी जी ने कहा कि एक श्रेष्ठ नेता केवल आदेश देने ('Telling') का काम नहीं करता, बल्कि अपनी टीम के साथ सीधा संवाद ('Talking') स्थापित करता है। संवाद से ही विश्वास और आपसी समझ (Trust & Understanding) गहराती है।
२. हार में हौसला, जीत में सराहना : सच्चा नेता वही है जो सफलता पर श्रेय देता है और असफलता के समय टीम का ढाल बनकर खड़ा होता है।
३. 2023 वर्ल्ड कप का प्रसंग: उन्होंने वर्ष 2023 के क्रिकेट वर्ल्ड कप का एक भावुक प्रसंग उद्धृत करते हुए बताया कि जब भारतीय टीम फाइनल मैच हार गई थी, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं खिलाड़ियों के 'ड्रेसिंग रूम' में पहुँचे और उनका मनोबल बढ़ाया। यही एक सच्चे नेतृत्व की सबसे बड़ी पहचान और शक्ति है।
प्रतिभा का सम्मान और कार्यों का सही वितरण:
१. रसोई व मसालों का उदाहरण : साध्वी जी ने रसोई का उदाहरण देते हुए समझाया कि जैसे सब्जी का स्वाद हर मसाले की सही मात्रा और महत्व पर निर्भर करता है, ठीक वैसे ही संगठन की सफलता हर सदस्य की अपनी विशिष्ट योग्यता को पहचानने और उन्हें सही जिम्मेदारी देने में छिपी है।
२. लकड़ी के गट्ठर का हुनर : पाश्चात्य दार्शनिक 'डेमोक्राइटस' की कथा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि एक बच्चे द्वारा लकड़ियों को सुव्यवस्थित बांधने के कौशल ने दार्शनिक का दिल जीत लिया। कार्य छोटा हो या बड़ा, यदि उसे पूर्ण हुनर और लगन से किया जाए, तो वह असाधारण बन जाता है।