'स्वावलंबन से जागती है आत्म-शक्ति, कर्तृत्व से बढ़ता है 'श्राविका गौरव' : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 22 सितम्बर, 2026

'स्वावलंबन से जागती है आत्म-शक्ति, कर्तृत्व से बढ़ता है 'श्राविका गौरव' : आचार्यश्री महाश्रमण

जन-जन के मानस को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान करने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी ने सुधर्मा सभा में आयोजित प्रातःकालीन मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में आगम 'उत्तरज्झयणाणि' के २६वें अध्ययन पर आधारित निर्धारित विषय ‘सम्भोज प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ पर पावन संबोध प्रदान किया। पूज्य गुरुदेव ने सुधर्मा सभा में उपस्थित अपार जनमेदिनी को सामुदायिक जीवन में साधना, स्वावलंबन और पारस्परिक सहयोग के व्यावहारिक सूत्र प्रदान किए।
सामुदायिक साधना और सम्भोज : संगठन व सहकार का क्रम :
१. संघीय जीवन की व्यवस्था : आचार्यश्री ने फरमाया कि साधु समुदाय अनेक व्यक्तियों का समूह होता है। यद्यपि प्राचीन काल में एकाकी साधना करने वाले साधु भी सम्मत रहे हैं, किंतु हमारी वर्तमान व्यवस्था में मुख्य रूप से सामुदायिक साधना का उपक्रम ही चलता है, एकाकी साधना सामान्यतया सम्मत नहीं है।
२. मंडली भोजन व दैनिक चर्या : वर्तमान में जैन विश्व भारती लाडनूँ में साधु-साध्वियों का बड़ा समुदाय प्रवास कर रहा है और समणियाँ भी हैं। ऐसी स्थिति में संघ में साथ में आहार करना (मंडली भोजन), कक्षाओं में बैठना, प्रतिक्रमण करना, चितारना, गोष्ठी, चर्चा व वार्ता आदि भी मंडली के क्रम में संपन्न होते हैं।
३. सहनशीलता व सौहार्द्र का विकास : पूज्यश्री ने फरमाया कि मंडली भोजन को यदि हम प्रयोग के रूप में देखें तो इसमें थोड़ी साधना भी निहित है। यदि साथ में आहार करते समय साधु को थोड़ा सहन भी करना पड़े, तो वह एक साधना बन जाती है। इससे संघ के भीतर सौहार्द्र और मैत्री भाव निरंतर बना रहता है। अधिक साधुओं के एक साथ भोजन करने में समय अधिक लग सकता है, इसलिए जैसी अनुकूलता हो वैसी सुंदर व्यवस्था की जा सकती है।
सम्भोज प्रत्याख्यान : परावलंबन से मुक्ति और स्वावलंबन की साधना :
१. आगमिक समाधान और स्वावलंबन : आगम में प्रश्न किया गया है कि सम्भोज प्रत्याख्यान से जीव क्या प्राप्त करता है? इसका समाधान देते हुए पूज्यश्री ने फरमाया कि सामान्य स्थिति में तो साथ में भोजन होता है, किंतु यदि आगे की विशेष साधना करनी हो तो साधु को अकेले में ही आहार करना चाहिए।
२. आलंबनों का क्षय : आगम में कहा गया है कि सम्भोज प्रत्याख्यान से साधु अपने आलंबनों को क्षीण कर देता है, अर्थात वह परावलंबी नहीं रहता। स्वयं गोचरी लाना, अकेले में भोजन करना, स्वयं के वस्त्र धोने से लेकर पानी साफ करना और पानी लाना आदि सभी कार्य अकेले करना स्वावलंबन की एक उत्कृष्ट साधना है। अपना कार्य स्वयं करना और दूसरों से अनावश्यक सहयोग न लेना ही स्वावलंबन का सच्चा प्रयोग है।
३. समता और मोक्ष मार्ग : जो निरावलंबन साधु होता है, वह अपनी गोचरी में संतुष्ट रहता है और दूसरों के लाभ में आस्वाद नहीं लेता। वह अपनी मोक्ष की साधना में अधिक प्रवृत्त हो सकता है और आत्मा में समता भाव को प्राप्त करता है।
श्राविका गौरव सम्मान:
अभातेममं का ५१वाँ अधिवेशन 'संवाद':
आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में अखिल भारतीय तेरापंथ महिला मंडल के ५१वें राष्ट्रीय अधिवेशन 'संवाद' का मंचीय उपक्रम रहा। इस अवसर पर अभातेममं द्वारा कनक बरमेचा को वर्ष २०२६ का 'श्राविका गौरव' अलंकरण प्रदान किया गया, जिस पर उन्होंने अपनी भावाभिव्यक्ति दी।
चतुर्थ तीर्थ– श्राविका : साध्वीप्रमुखा विश्रुतविभा जी ने कनकबाई को ज्ञान के प्रति अच्छी अभिरुचि और श्रद्धा-संपन्नता का प्रतीक बताते हुए मंगल आशीर्वाद दिया। आचार्य श्री ने पावन पाथेय प्रदान करते हुए फरमाया कि जैन शासन में साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका—ये चार तीर्थ हैं। चौथा स्थान श्राविका का है, जो रत्नों की माला के समान हैं। श्राविका के उत्कृष्ट कर्तृत्व से इस 'श्राविका गौरव' सम्मान का गौरव निरंतर बढ़ता रहे।

'काम प्यारो है, चाम प्यारी कोनी'....

साधु जीवन केवल व्यक्तिगत साधना ही नहीं, बल्कि संघीय अनुशासन और परस्पर सहयोग का उत्कृष्ट उदाहरण है। पूज्य प्रवर आचार्यश्री महाश्रमण जी ने साधु-साध्वी समुदाय में पारस्परिक सहयोग और वृद्ध संतों की सेवा-व्यवस्था पर अत्यंत व्यावहारिक मार्गदर्शन फरमाया।
१. मूल सिद्धांत : साधना और सेवा ही प्राथमिकता : पूज्य प्रवर ने लोक-सूत्र—'काम प्यारो है, चामप्यारी कोनी' के माध्यम से स्पष्ट किया कि साधक के लिए देह-सुख (चाम) से अधिक महत्वपूर्ण साधना और कर्तव्य-पालन (काम) है। जो साधक अपनी क्षमतानुसार निरंतर सेवा में संलग्न रहता है, वह संघ के लिए सदैव आदरणीय और उपयोगी बना रहता है।
२. कार्य-विभाजन और परस्पर सहयोग: सिंघाड़े (समूह) की व्यवस्था को सुगम बनाने के लिए आचार्यश्री ने प्रेरणा प्रदान की।
१. वृद्ध संतों की भूमिका : 80 वर्ष से अधिक आयु के संत ठिकाने (आवास) पर रहकर पात्रियाँ साफ करने, वस्त्र समेटने, सिलाई व स्वच्छता जैसे सेवा कार्य संभाल सकते हैं।
२. युवा संतों का दायित्व : युवा संत गोचरी लाने, जल व्यवस्था और अन्य बाहरी श्रमसाध्य कार्यों की जिम्मेदारी निभाएँ।
३. संघीय चेतना और आत्म-संतोष : सम्मान और धरोहर: वृद्ध संत संघ की धरोहर हैं, युवा संतों को उनके प्रति सदैव आदर और कृतज्ञता का भाव रखना चाहिए।
स्वाभिमान और आत्म-संतोष : क्षमतानुसार योगदान देने से वृद्ध संतों में यह आत्म-संतोष रहता है कि वे संघ पर भार नहीं हैं।
'सेवा केंद्र' की कम आवश्यकता : ठिकाने पर ही इस सहज सहयोग से वृद्ध संतों को 'सेवा केंद्र' भेजने की आवश्यकता कम होती है।

सर्द रातों की वो अनसुनी गुरु-कृपा : मुनि कुमारश्रमण जी का भावुक संस्मरण...

मुनि कुमारश्रमण जी ने नवदीक्षित एवं बाल संतों के प्रति पूज्य प्रवर के असीम वात्सल्य और गुरु-दायित्व के अपने संस्मरण साझा किए।
बाल संतों के प्रति पूज्य प्रवर का वात्सल्य:
१. वस्त्र व्यवस्थित करना : मुनि कुमार श्रमण जी ने बाल मुनि अवस्था के संस्मरण साझा करते हुए बताया कि किस तरह ठंड के दिनों में सोते समय हम जैसे बाल संतों के ओढ़ने वाले ऊनी वस्त्र अव्यवस्थित हो जाते थे, तो पूज्य प्रवर स्वयं आकर उनके कपड़ों को ठीक (व्यवस्थित) करते थे।
२. सर्दियों में विशेष सुरक्षा : मुनि कुमारश्रमण जी ने बताया कि अन्य छोटे बाल मुनियों को भीषण ठंड से बचाने के लिए ऊनी वस्त्र को तीन तरफ से सी दिया जाता था (एक बोरी की तरह पैक कर दिया जाता था) ताकि उन को ठंड से सुरक्षित रखा जाए।
नवदीक्षित : पौधे से परिपक्व वृक्ष तक की यात्रा:
१. नवदीक्षित एक 'पौधा' : पूज्य प्रवर ने फरमाया कि नवदीक्षित संत-साध्वियाँ एक छोटे पौधे के समान होते हैं। प्रारंभिक वर्षों में उन्हें विशेष सुरक्षा, सिंचन और स्नेहपूर्ण देखभाल की आवश्यकता होती है।
२. संदेश : वात्सल्य और सेवा-भावना से परिपूर्ण यही गुरु-कृपा नवदीक्षितों को संघ के लिए समर्थ और परिपक्व साधक-रूपी 'वृक्ष' बनाती है।