प्रखर चिंतन, दूरदर्शिता और वात्सल्य के प्रतीक थे अष्टमाचार्य कालूगणी

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बालोतरा।

प्रखर चिंतन, दूरदर्शिता और वात्सल्य के प्रतीक थे अष्टमाचार्य कालूगणी

प्रोफेसर डॉ. साध्वी मंगलप्रज्ञा जी के सान्निध्य में, बालोतरा तेरापंथ भवन के अमृत -सभागार में तेरापंथ के अष्टमाचार्य कालूगणिराज की वार्षिक पुण्यतिथि मनाई। इस अवसर पर अपने उद्‌गार में साध्वीश्री जी ने कहा- आज महामना कालूगणी के प्रति हम कृतज्ञतामय श्रद्धासिक्त नमन करते हैं, जिन्होंने तेरापंथ संघ को अपनी प्रवर चिन्तन शैली, दूरगामी सोच से शक्ति सम्पन्न बनाया है। संस्कृत भाषा के विकास का प्रारंभ भी कालूगणी की देन है। आचार्य श्री तुलसी और आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के रूप में तेरापंथ संघ को दो-दो आचार्य मिले, जिन्हें बाल्यावस्था में श्रुत सिंचन, संस्कार कालुगणी राज से प्राप्त हुए। कहा जा सकता है तेरापंथ धर्म संघ के विकास में आप श्री का चिंतन, श्रम बेजोड़ रहा । प्रोफेसर डॉ साध्वी मंगलप्रज्ञा जी ने कहा- हमने कालू गणी को साक्षात् नहीं देखा पर उनके शिष्य के रूप में रहे आचार्यश्री तुलसी आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी से उनकी जीवन- गाथाएं सुनी हैं। अष्टमाचार्य कालू गणी वात्सलय मूर्ति, उदारमना आचार्य रहे हैं। अनेक प्रतिभा सम्पन्न संत सतिया उनके शासन काल में योग्य बने, जिन्होंने साहित्य लेखन आदि का कार्य किया। कालू गणी ने जीवनभर संघीय सारणा - वारणा में अपनी शक्ति का सम्यक नियोजन किया। दिव्यात्मा कालू गणी के जीवन का अध्ययन करने से लगता है, उनकी संकल्प शक्ति सहजशक्ति और सृजन शक्ति भी अनुकरणीय है। उनकी पारखी नजर ने और तेरापंथ संघ के शुभभविष्य को सजाने का सपना ही नहीं लिया, अपने उत्तराधिकारी के रूप में आचार्य तुलसी जैसी अनमोल कृति की नियुक्ति की (सम्पूर्ण तेरापंथ संघ उनके इस वरदान के प्रति नतमस्तक है। उन्होंने कहा- आज वार्षिक पुण्यतिथि के अवसर पर श्रद्धाभावों से उस महान विभूति को नमन करते हुए यही कामना करते हैं- संघ संवर्धन में सतत योगभूत बने और हमारी शक्ति प्रवर्धमान रहे। साध्वी सुदर्शन प्रभा, साध्वी डॉ चैतन्यप्रभा, साध्वी डॉ शौर्य प्रभा ने श्रद्धाभावों से पूज्य कालू गणी के गुणों को सहसंगान के साथ श्रद्धाभावना व्यक्त की।