गुरुवाणी/ केन्द्र
दुर्लभ है मनुष्य जन्म : संयम और धर्म-श्रवण ही है जीवन की असली पूँजी : आचार्यश्री महाश्रमण
जन-जन के कल्याण में निरत, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में 'अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह' का चतुर्थ दिवस 'पर्यावरण शुद्धि दिवस' के रूप में सुधर्मा सभा भवन में अपार भावउल्लास के साथ आयोजित हुआ। इस पावन अवसर पर पूज्यप्रवर ने उत्तरज्झयणाणि आगम के पावन सूत्रों का आलम्बन लेते हुए समुपस्थित विशाल जन-समुदाय को अपनी ओजस्वी अमृत देशना प्रदान की।
उत्तरज्झयणाणि आगम: जीवन की चार अत्यंत दुर्लभ संपदाएँ–
१. मानुष्यत्व (दुर्लभ मनुष्य जन्म) : पूज्यप्रवर ने फरमाया कि इस संसार में चार चीजें अत्यंत दुर्लभ हैं—मानुष्यत्व, श्रुति (धर्म श्रवण), निर्ग्रन्थ प्रवचन पर श्रद्धा, और संयम में पराक्रम। अनंत-अनंत काल से चौरासी लाख जीव योनियों में भटकते रहने के बाद भी अधिकांश जीवों को मनुष्य जन्म सुलभ नहीं होता। चारों गतियों में संज्ञी मनुष्य अत्यंत अल्प संख्या में हैं। आज हमें जो यह मनुष्य भव प्राप्त हुआ है, यह अनमोल और दुर्लभ अवसर है।
२. श्रुति (धर्म-श्रवण की सुलभता) : आचार्यश्री ने फरमाया कि मनुष्य जन्म मिलने के बाद दूसरी दुर्लभ बात है 'श्रुति' यानी सत्संग व धर्म का श्रवण। कई मनुष्य पंचेन्द्रिय होकर भी सुनने की क्षमता नहीं रखते, और जिनमें क्षमता है, वे भी प्रायः आलस्य, प्रमाद या संतों के प्रति अनासक्ति के कारण प्रवचन सुनने का लाभ नहीं उठा पाते। साधु का व्याख्यान यदि एक घंटा भी सुन लिया जाए, तो उससे जीवन को सही दिशा और सर्वोत्तम पथ-दर्शन प्राप्त होता है। प्रवचन श्रवण से अनेक अनसुलझी जिज्ञासाओं का सहज और त्वरित समाधान प्राप्त हो जाता है।
३. श्रद्धा और संयम का पराक्रम : पूज्यश्री ने तीसरी दुर्लभ चीज़ 'श्रद्धा' को बताते हुए फरमाया कि निर्ग्रन्थ आगमों और वीतराग वाणी पर परम श्रद्धा होना सहज नहीं है। वहीं चौथी दुर्लभ बात संयम के पथ पर पराक्रम करना है। गृहस्थों में धर्म के प्रति श्रद्धा तो होती है, परंतु सांसारिक व पारिवारिक उत्तरदायित्वों और परिस्थितियों के कारण वे चाहकर भी पूर्ण संयमी जीवन नहीं जी पाते। ऐसे में यदि किसी के भीतर श्रद्धा के साथ मुमुक्षुत्व भाव जागृत हो जाए और वह संयमी जीवन (दीक्षा) अंगीकार कर ले, तो यह महान सौभाग्य की बात है।
धर्म के दो रूप: काल-प्रतिबद्ध बनाम कालातीत धर्म–
१. समय और नियमों का विवेक: पूज्यप्रवर ने धर्म की अत्यंत सूक्ष्म और व्यावहारिक व्याख्या करते हुए फरमाया कि धर्म दो प्रकार का होता है—'काल-प्रतिबद्ध धर्म' और 'कालातीत धर्म'। सामायिक, पौषध, जप, स्वाध्याय आदि साधनाएँ काल-प्रतिबद्ध धर्म के अंतर्गत आती हैं, जिनके लिए एक निश्चित समय सीमा निर्धारित होती है।
२. जीवनभर आचरण में उतरने वाला कालातीत धर्म: आचार्यश्री ने स्पष्ट फरमाया कि कालातीत धर्म का पालन करने के लिए अलग से समय निकालने की कोई आवश्यकता नहीं होती। नशा-मुक्ति, मांसाहार का त्याग, असत्य और चोरी का सर्वथा त्याग—इन नैतिक नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करना ही कालातीत धर्म है। यह चौबीसों घंटे मनुष्य की जीवनशैली का हिस्सा बना रहता है। सामायिक का एक घंटा साधक को अनेक सावद्य (पाप) कार्यों और दुष्प्रवृत्तियों से सहज निवृत्त कर देता है।
पर्यावरण शुद्धि: अहिंसा का व्यावहारिक प्रयोग और साधु की पूँजी–
१. बिजली-पानी का संयम ही अहिंसा : पूज्यप्रवर ने 'पर्यावरण शुद्धि दिवस' के संदर्भ में फरमाया कि हमारे जीवन में अहिंसा, संयम और तप की त्रिवेणी निरंतर प्रवाहित होती रहनी चाहिए। अहिंसा की चेतना केवल बौद्धिक सिद्धांतों तक सीमित न रहकर दैनिक व्यवहार में स्पष्ट झलकनी चाहिए। बिजली और पानी का उपयोग अत्यंत संयमपूर्वक होना चाहिए; इनका थोड़ा-सा भी अपव्यय अहिंसा का अतिक्रमण है।
२. सादगीपूर्ण जीवन और साधु की असली पूँजी : पूज्यश्री ने फरमाया कि हमारी जीवनशैली सादगीपूर्ण होनी चाहिए। मनुष्य को बाहरी तड़क-भड़क, भौतिक पदार्थों की अंधी दौड़ और अपरिग्रह के विपरीत लालसाओं से बचना चाहिए।
नवदीक्षित समणी वृंद की अंग्रेजी में प्रस्तुति व मासखमण तप–
१. वैश्विक भाषा में प्रवचन का सार : मुख्य मंगल प्रवचन के उपरांत पूज्य आचार्यश्री के विशेष निर्देशानुसार, विगत दो-तीन वर्षों में दीक्षित हुई नवदीक्षित समणी वृंद ने आज के सम्पूर्ण प्रवचन के मुख्य बिंदुओं का सार अत्यंत प्रभावी ढंग से २-३ मिनट में अंग्रेजी (English) भाषा में गुरुदेव के चरणों में प्रस्तुत किया, जिसे उपस्थित जनसमूह ने भूरी-भूरी सराहना प्रदान की।
२. मासखमण तप का प्रत्याख्यान : कार्यक्रम के दौरान जोधपुर निवासी हर्षिता किशोर मनोत ने पूज्य आचार्यश्री के श्रीमुख से २७ दिन की कठिन तपस्या (मासखमण) का भावपूर्ण प्रत्याख्यान (संकल्प) ग्रहण कर आशीर्वाद प्राप्त किया।