'अनुशासन में केवल कठोरता नहीं, करुणा और वात्सल्य का संगम भी ज़रूरी' : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 06 अक्टूबर, 2026

'अनुशासन में केवल कठोरता नहीं, करुणा और वात्सल्य का संगम भी ज़रूरी' : आचार्यश्री महाश्रमण

लाडनूँ की पावन धरा पर स्थित जैन विश्व भारती परिसर में योगक्षेम वर्ष हेतु प्रवास कर रहे जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण जी आप्त पुरुषों की वाणी से चतुर्विध धर्मसंघ को अध्यात्म रस से आप्लावित कर रहे हैं।
'अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह' के अंतर्गत छठा दिन 'अनुशासन दिवस' के रूप में सुधर्मा सभा भवन में अपार भाव-उल्लास और गरिमा के साथ आयोजित हुआ।
स्वानुशासन और परानुशासन का संतुलन : लोकतंत्र व संविधान का मेरुदंड –
१. खुद अनुशासित होकर ही दूसरों को दे सकते हैं दिशा : पूज्यप्रवर ने मुख्य मंगल प्रवचन में फरमाया कि अनुशासन के दो प्रमुख आयाम होते हैं—एक आत्मानुशासन (स्वानुशासन/निज प्रशासन) और दूसरा परानुशासन। दूसरों पर अनुशासन करना उपयोगी हो सकता है, परंतु उसके लिए स्वयं का अनुशासित होना सर्वाधिक अपेक्षित है। जो व्यक्ति स्वयं पर नियंत्रण नहीं रख सकता, वह दूसरों पर प्रभावी अनुशासन कैसे कर सकेगा? अनुशासन की शुरुआत सदैव स्वयं से होनी चाहिए।
२. संविधान, न्यायपालिका और निष्पक्षता : आचार्यश्री ने स्पष्ट फरमाया कि दुनिया की कोई भी शासन व्यवस्था हो—राजतंत्र हो या लोकतंत्र—सभी में अनुशासन अनिवार्य है। कर्तव्य और अनुशासन के बिना लोकतंत्र का देवता विनाश को प्राप्त हो सकता है। किसी भी देश या संस्था का संविधान उसका मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) होता है। न्यायपालिका और दंड संहिता लोगों की भलाई व व्यवस्था बनाए रखने के लिए होती हैं, अन्यथा अराजकता फैल सकती है। अनुशासन में निष्पक्षता, निर्लोभता, निर्भीकता और विवेक का होना अनिवार्य है ताकि नियम सबके लिए समान रहें।
तेरापंथ धर्मसंघ की अनुशासन परंपरा : कड़ाई के साथ करुणा और वात्सल्य–
१. आचार्य भिक्षु से चली आ रही स्वर्णिम परंपरा : आचार्यश्री ने फरमाया कि तेरापंथ धर्मसंघ में अनुशासन का क्रम आद्यप्रवर्तक आचार्य भिक्षु के समय से चला आ रहा है और आज भी निरंतर प्रवाहित हो रहा है। अनुशासन का अर्थ केवल कड़ाई नहीं, बल्कि उसके साथ करुणा और वात्सल्य भाव का पुट होना भी अत्यंत आवश्यक है।
२. एक आज्ञा में उच्च शिक्षित साधु-साध्वी : पूज्यश्री ने फरमाया कि हमारे धर्मसंघ में साधु-साध्वियों का जीवन पूर्ण अनुशासित है। कोई साधु-साध्वी या समणी कितनी भी उच्च शिक्षित हो, पीएचडी/डॉक्टरेट उपाधि धारक हो या प्रखर वक्ता हो—सभी एक ही अनुशासन और एक आचार्य की आज्ञा-निर्देश के अंतर्गत गतिमान रहते हैं।
गुरु की आज्ञा का पालन और परस्पर सहयोग हमारे संघ की बहुत बड़ी विशेषता है। 'परस्परोपग्रहो जीवानाम्' का सूत्र हमारे लिए सुंदर मार्गदर्शक है। गृहस्थों को भी शांति व मृदुता के साथ मैत्रीपूर्ण अनुशासन का पालन करना चाहिए।
सूरजमल तापड़िया विद्यालय के विद्यार्थियों का संकल्प व संस्कृत भाषण:
१. छात्रों ने अंगीकार किए अणुव्रत संकल्प : कार्यक्रम के अवसर पर सूरजमल तापड़िया संस्कृत विद्यालय के विद्यार्थी एवं शिक्षकगण उपस्थित रहे। विद्यार्थियों ने पूज्यप्रवर के चरणों में उपस्थित होकर नैतिकता, सद्भावना और नशामुक्ति के अणुव्रत संकल्प स्वीकार किए।
२. संस्कृत में ओजस्वी सम्भाषण: विद्यालय के छात्र भैया देवेश वासु ने पूज्यश्री के समक्ष संस्कृत भाषा में अत्यंत प्रभावकारी और सुंदर भाषण प्रस्तुत किया।
ग्रंथ लोकार्पण, मासखमण तपस्या व 'बोधि सम्मान' अलंकरण–
१. पुस्तक का लोकार्पण : पाली निवासी विजय कृष्ण नाहर ने अपनी शोधपूर्ण कृति 'ज्योति पुरुष महर्षि जयाचार्य' पूज्य आचार्यश्री के चरणों में लोकार्पित की और अपने विचार व्यक्त किए।
२. मुनि श्री द्वारा मासखमण तप: सुधर्मा सभा में मुनि भरत कुमार जी ने पूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से २७ दिन की तपस्या (मासखमण) का भावपूर्ण प्रत्याख्यान ग्रहण कर आशीर्वाद प्राप्त किया।
३. 'बोधि सम्मान' (भंवरलाल कर्णावट फाउंडेशन, राजसमंद): स्वर्गीय भंवरलाल जी कर्णावट की स्मृति में स्थापित 'भंवरलाल कर्णावट फाउंडेशन, राजसमंद' द्वारा समाज के दो प्रतिष्ठित श्रावकों को 'बोधि सम्मान' से अलंकृत किया गया:
पदमचंद पटावरी (राजसमंद): इन्हें 'बोधि सम्मान २०२५' से अलंकृत किया गया।
यह सम्मान उन्हें तेरापंथ धर्मसंघ में पाँच दशकों से अधिक के समर्पण, अभातेयुप (ABTYP) तथा अन्य संस्थागत सेवाओं के लिए प्रदान किया गया।
विजय कृष्ण नाहर (पाली): इन्हें 'बोधि सम्मान २०२६' प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्हें उनके साहित्य लेखन, इतिहास संरक्षण और विशेष रूप से तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्यों पर लिखी शोधपूर्ण पुस्तकों के लिए दिया गया।