'धागा टूटे तो जुड़ जाए, जीवन टूटे तो नहीं': नशा छोड़ अपनाएँ अणुव्रत’: आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 05 अक्टूबर, 2026

'धागा टूटे तो जुड़ जाए, जीवन टूटे तो नहीं': नशा छोड़ अपनाएँ अणुव्रत’: आचार्यश्री महाश्रमण

भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अखंड परिव्राजक, जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी आगम वाणी के माध्यम से जन-जन को आध्यात्मिक अभिसिंचन प्रदान कर रहे हैं। 'अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह' के अंतर्गत आज पंचम दिवस पूज्यप्रवर की पावन सन्निधि में 'नशा मुक्ति दिवस' के रूप में सुधर्मा सभा भवन में गरिमामय वातावरण के साथ समायोजित हुआ।
उत्तरज्झयणाणि आगम: जीवन-रूपी धागा और धर्माचरण की सक्षमता–
१. अनमोल जीवन और बुढ़ापे की लाचारी : पूज्यप्रवर ने मुख्य मंगल प्रवचन में फरमाया कि मनुष्य जीवन मिलना अत्यंत महत्त्वपूर्ण बात है, परंतु जीवन रूपी धागा यदि एक बार टूट जाए तो उसे दोबारा जोड़ना संभव नहीं है। यदि व्यक्ति वृद्धावस्था से ग्रस्त हो जाए तो उसका कोई त्राण नहीं रहता। जो युवावस्था में सबके आकर्षण का केंद्र था, वृद्धावस्था में उसे सेवा करने वाला मिलना भी कठिन हो जाता है।
२. तीन बाधाओं से पूर्व साध लें जीवन : शास्त्र का हवाला देते हुए आचार्यश्री ने फरमाया कि जब तक शरीर में सक्षमता है, तब तक धर्माचरण कर लेना चाहिए। शरीर की सक्षमता में तीन मुख्य बाधाएँ हैं—बुढ़ापा, व्याधि (बीमारी) और इंद्रियहीनता। जब तक बुढ़ापा पीड़ित न करे, शरीर रोगग्रस्त न हो और इंद्रियाँ क्षीण न हों, उससे पूर्व ही धर्म, सेवा कार्य और लंबी आध्यात्मिक यात्राएँ कर लेनी चाहिए।
नशा मुक्ति दिवस: प्रमाद, पापकर्म और अणुव्रत का संकल्प–
१. नशा है आत्मा व परिवार का विनाशक : पूज्यश्री ने फरमाया कि नशा भी प्रमाद का ही एक उग्र रूप है। नशे की गिरफ्त में आने के बाद व्यक्ति मूढ़ (विवेकहीन) हो जाता है, जिससे वह पापाचार और दुर्गति के मार्ग पर चला जाता है।
नशे की जकड़न ऐसी बनती है कि व्यक्ति चाहकर भी इससे निकल नहीं पाता। नशा न केवल आत्मा का पतन करता है, बल्कि शारीरिक, आर्थिक और पारिवारिक तबाही का कारण बनता है।
२. अणुव्रत का नशा-मुक्त अभियान : आचार्यश्री ने परमपूज्य आचार्यश्री तुलसी के योगदान का स्मरण करते हुए फरमाया कि गुरुदेव तुलसी ने अणुव्रत के माध्यम से जन-जन को संयम की प्रेरणा देकर नशा-मुक्त बनाया। अणुव्रत की संकल्पत्रयी (सद्भावना, नैतिकता व नशामुक्ति) में भी नशामुक्ति प्रमुख है। जैन और अजैन—सभी को नशामुक्ति की ओर ध्यान देना चाहिए। गृहस्थों का जीवन पूर्णतः नशा-मुक्त और संयममय होना चाहिए।
चारित्रात्माओं को अप्रमाद की प्रेरणा व अतिथियों के विचार–
१. साधु जीवन में प्रमाद का स्थान नहीं : पूज्यप्रवर ने उपस्थित विशाल श्रमण-श्रमणी वृंद को सम्बोधित करते हुए फरमाया कि साधु जीवन में प्रमाद के लिए कोई स्थान नहीं है। साधु का समय स्वाध्याय, जप, ध्यान और परोपकार में बीतना चाहिए। जैसे दान से हाथ शोभित होते हैं, वैसे ही हाथ में आगम या ज्ञान का ग्रंथ होने से हाथ की शोभा बढ़ती है। इस दुर्लभ अवसर का लाभ उठाकर अप्रमाद की स्थिति को पुष्ट करना चाहिए।
२. अतिथियों के विचार : कार्यक्रम में लाडनूँ अणुव्रत समिति के अध्यक्ष शांतिलाल बैद एवं सुभाष स्कूल के डायरेक्टर रामगोपाल मील ने पूज्यश्री के चरणों में अपने भावपूर्ण विचार रखे।
तपस्या का प्रत्याख्यान :
मुनि नमिकुमार जी द्वारा ४४ की तपस्या: पूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से मुनि नमिकुमार जी ने ४४ की कठिन तपस्या का भावपूर्ण प्रत्याख्यान ग्रहण किया।

'मांग वेतन बढ़ाने की थी... और कटघरे में आ गया नशा!'

आचार्यश्री महाश्रमण जी ने एक रोचक दृष्टांत के ज़रिए नशामुक्ति और आर्थिक स्वावलंबन का प्रेरक संदेश दिया।
१. मजदूरों की गुहार और समस्या: एक प्रभावशाली संत के प्रवचन के उपरांत कुछ मजदूर अपनी आर्थिक तंगी और गरीबी का रोना लेकर उनके पास पहुंचे। उन्होंने अपनी व्यथा सुनाते हुए कहा कि सरकार द्वारा मिलने वाला वेतन उनके परिवार के गुजारे के लिए बहुत कम है। मजदूरों ने संत से करबद्ध प्रार्थना की कि वे अपने प्रभाव का उपयोग कर सरकार से उनका वेतन बढ़वाने में मदद करें।
२. संत का तीखा प्रश्न और आईना: संत ने मजदूरों की बात को पूरी सहानुभूति से सुना और सच्चाई जानने के लिए उनसे एक सवाल किया—'क्या आपमें से कोई शराब, बीड़ी, सिगरेट या तंबाकू का सेवन करता है?' यह सुनते ही अधिकांश मजदूरों ने हाथ उठाकर स्वीकार किया कि वे इनमें से किसी न किसी नशे के आदी हैं। इस पर संत ने उन्हें सच्चाई का आईना दिखाया।
३. गरीबी का असली कारण: संत ने स्पष्ट शब्दों में समझाया कि उनकी तंगी का मूल कारण कम वेतन नहीं, बल्कि उनकी अपनी बुरी आदतें हैं। जो पैसा वे दिन-रात पसीना बहाकर कमाते हैं, उसका एक बड़ा हिस्सा नशे और व्यसनों में बर्बाद कर देते हैं।
यदि वे नशा करना छोड़ दें, तो उनकी आर्थिक स्थिति बिना वेतन बढ़ाए भी स्वतः सुधर जाएगी और उन्हें किसी के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा।
४. आचार्य श्री का पावन संदेश: आचार्य प्रवर ने इस दृष्टांत के माध्यम से फरमाया कि नशा केवल स्वास्थ्य और परिवार को तबाह नहीं करता, बल्कि आर्थिक बर्बादी का भी सबसे बड़ा कारण बनता है। इंसान अक्सर खुद गलत आदतों से गरीबी को पालता है और दोष दूसरों पर मढ़ता है। जीवन में बदलाव लाने के लिए व्यक्ति को स्वयं अपनी आदतों, व्यसनों पर नियंत्रण पाना होगा।

जब 100% Correct Homework पर भी बालक रो पड़ा...

आचार्यश्री महाश्रमण जी ने ईमानदारी और सच्चरित्रता के महत्व को रेखांकित करते हुए एक अत्यंत प्रेरणादायक दृष्टांत फरमाया।
१. शिक्षक का होमवर्क और पुरस्कार : दीपावली की छुट्टियों के बाद जब एक शिक्षक ने कॉपियाँ जाँचीं, तो एक बालक के सभी उत्तर बिल्कुल सही पाए गए। प्रसन्न होकर शिक्षक ने उसे कक्षा में पुरस्कार देने की घोषणा की।
२. बालक के आँसू और कड़वा सच : पुरस्कार की घोषणा सुनते ही वह बालक रोने लगा। उसने अत्यंत ईमानदारी से स्वीकार किया कि सारे उत्तर उसके स्वयं के थे, लेकिन एक सवाल न आने पर उसने अपने बड़े भाई की मदद ली थी। उसने कहा कि वह इस पुरस्कार का सच्चा हकदार है या नहीं, इसका निर्णय शिक्षक स्वयं करें।
३. सच्चाई का सम्मान : बालक की निष्छलता और सच्चाई से अभिभूत होकर शिक्षक ने कहा—'अब मैं तुम्हें उत्तरों के लिए नहीं, बल्कि तुम्हारी इस अद्भुत ईमानदारी के लिए पुरस्कार दूँगा।'
४. आचार्यश्री का पावन संदेश: आचार्य प्रवर ने फरमाया कि जीवन में केवल सफलता या अंक (Marks) पाने की दौड़ में भागने के बजाय ईमानदारी और उच्च नैतिक मूल्यों को अपनाना कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। सच्चा सम्मान अंकों से नहीं, बल्कि सच्चरित्रता से मिलता है।