व्यापार में ईमानदारी और परिवार में सहिष्णुता ही है व्यावहारिक अहिंसा : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 02 अक्टूबर, 2026

व्यापार में ईमानदारी और परिवार में सहिष्णुता ही है व्यावहारिक अहिंसा : आचार्यश्री महाश्रमण

जन-जन को सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति का अमर संदेश देने वाले जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, अखंड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में 'अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह' का द्वितीय दिवस 'अहिंसा दिवस' के रूप में गरिमामय माहौल में समायोजित हुआ। सुधर्मा सभा भवन में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में पूज्यप्रवर ने चतुर्विध धर्मसंघ को पावन अमृत देशना प्रदान करते हुए अहिंसा, अनेकांत और व्यावहारिक प्रामाणिकता पर व्यापक दिशा-निर्देश फरमाया।
अशांति का निवारण, विकास और आचार्य महाप्रज्ञ का ऐतिहासिक संदर्भ–
१. अहिंसा : शांति और विकास का आधार : पूज्यप्रवर ने फरमाया कि अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के अंतर्गत आज का दिवस 'अहिंसा दिवस' है। अहिंसा एक ऐसा शाश्वत तत्त्व है, जिसके बिना समाज में अशांति फैलती है। यदि शांति और प्रगति चाहिए, तो अहिंसा सबसे प्रमुख घटक है। यदि दो राष्ट्रों के बीच युद्ध या अशांति हो तो वे विकास की जगह अवनति की ओर चले जाते हैं।
२. गुजरात की अशांति में आचार्य महाप्रज्ञ की अहिंसा यात्रा : पूज्यश्री ने परम पूजनीय आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी द्वारा की गई ऐतिहासिक 'अहिंसा यात्रा' का स्मरण करते हुए फरमाया कि गुजरात में जब अशांति का माहौल था, तब आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी ने वहाँ की धरा पर कदम रखा था। पूज्य महाप्रज्ञ जी ने संदेश दिया था कि यदि शांति से रहना है और विकास की ऊँचाइयों को छूना है तो अहिंसा अनिवार्य है। हिंसा केवल विनाश और पतन लाती है।
३. साधु और गृहस्थ का अहिंसा व्रत : पूज्यश्री ने फरमाया कि साधु का जीवन पूर्णतः अहिंसक होता है। उसे मन, वचन, काया (कृत, कारित, अनुमोदना) से हिंसा का सर्वथा वर्जन रखना चाहिए। जैन आगमों में अहिंसा का अत्यंत सूक्ष्म व निपुण विवेचन मिलता है। साधु के साथ-साथ गृहस्थों को भी अपने जीवन में अधिकाधिक अहिंसा की भावना रखनी चाहिए।
अनेकांत: विचारों की अहिंसा और अनेकांतवाद का सही मर्म–
१. विचारों में दुराग्रह का त्याग : पूज्यप्रवर ने फरमाया कि जैन दर्शन के 'अनेकांत' में अहिंसा का बहुत गहरा दर्शन छिपा है। हमारे विचारों में दुराग्रह नहीं होना चाहिए। दूसरों के विचारों को भी यथा-औचित्य सुनने और समझने की उदारता होनी चाहिए। किसी भी ग्रंथ, पंथ या संत के पास यदि कोई अच्छी बात मिले तो उसका निसंकोच सम्मान करना चाहिए। यही विचारों की अहिंसा है।
२. अनेकांत संशयवाद नहीं, यथार्थवाद है : आचार्यश्री ने स्पष्ट फरमाया कि अनेकांत का अर्थ यह कदापि नहीं है कि जो कुछ कहा जा रहा है वह सब सही है। अनेकांत संशयवाद (Skepticism) नहीं है, बल्कि यह 'यथार्थवाद' है, जहाँ हर बात को उसकी उचित अपेक्षा (Perspective) से देखा जाता है। मूल अहिंसा आत्मा में विद्यमान है—जो अप्रमत्त (जागरूक) है वह अहिंसक है और जो प्रमत्त है वह हिंसक है।
३. व्यापार व परिवार में सहिष्णुता : पूज्यश्री ने फरमाया कि अणुव्रत व्यवसाय में ईमानदारी और पारिवारिक जीवन में सहिष्णुता की प्रेरणा देता है। अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक कष्ट न देना ही नहीं, बल्कि अपने विचारों, व्यवसाय और व्यवहार में ईमानदारी व समता अपनाना है। अहिंसा कायरों का नहीं, बल्कि शौर्य और अभय का मार्ग है।
दिल्ली चातुर्मास २०२७ की तिथि घोषित व गीत संगान–
१. १६ जुलाई २०२७ को दिल्ली चातुर्मासिक प्रवेश : आगामी वर्ष २०२७ के दिल्ली चातुर्मास के संदर्भ में दिल्ली से पधारे विशाल श्रावक-श्राविका समाज की उपस्थिति में पूज्य आचार्यश्री ने चातुर्मासिक प्रवेश की पावन तिथि १६ जुलाई २०२७ (आषाढ़ शुक्ला त्रयोदशी) निर्धारित फरमाई। उल्लेखनीय है कि यह पावन तिथि आद्यप्रवर्तक आचार्य भिक्षु का बोधि दिवस एवं युवाचार्य मनोनयन दिवस भी है।
२. 'जय हे, जय जीवन दाता...' गीत संगान : प्रवचन के दौरान पूज्य आचार्यश्री ने अहिंसा को शक्ति स्वरूपा माता के रूप में सम्बोधित करते हुए 'जय हे, जय जीवन दाता... सम भाव सुधा का सिंचन दो, अमिताभ अहिंसा माता' गीतिका का ओजस्वी संगान किया, जिसने सम्पूर्ण सुधर्मा सभा को अहिंसा के पावन भावों से सराबोर कर दिया।
विचार अभिव्यक्ति एवं श्रद्धा अर्पण:
१. दिल्ली समाज की भावाभिव्यक्ति : आचार्य श्री महाश्रमण प्रवास व्यवस्था समिति (दिल्ली) के अध्यक्ष कन्हैयालाल पटावरी ने दिल्ली के सम्पूर्ण श्रावक-श्राविका समाज की ओर से पूज्यश्री के चरणों में भावाभिव्यक्ति प्रस्तुत की। उन्होंने दिल्ली में २०२७ के चातुर्मास और २०२८ के मर्यादा महोत्सव को ऐतिहासिक बनाने का दृढ़ संकल्प व्यक्त किया।
२. पालिका अध्यक्ष का सम्बोधन : कार्यक्रम में लाडनूँ नगर पालिका अध्यक्ष परवीन सिसोदिया ने भी पूज्य गुरुदेव के दर्शन कर अपनी भावपूर्ण अभिव्यक्ति दी।

क्या 'सच' में 'सच' से प्यार है हमें... या सिर्फ अपनी बात सही साबित करनी है...?

पूज्य आचार्यश्री महाश्रमण जी ने 'वैचारिक अहिंसा' और 'अनेकांत' के गूढ़ सिद्धांत को अत्यंत सरल एवं व्यावहारिक धरातल पर प्रस्तुत करते हुए यह पावन प्रेरणा प्रदान की–
1. पूर्वाग्रह से मुक्ति: दुराग्रह का त्याग: हमारे पास अपने विचार होने चाहिए, किंतु उनके प्रति कोई दुराग्रह (ज़िद) नहीं होना चाहिए। विवेकशील व्यक्ति वही है जो अपने दृष्टिकोण के साथ-साथ दूसरों के विचारों को भी यथा-अवसर और सम्यक् दृष्टि से समझने का प्रयास करता है।
2. सत्य का सम्मान: जहाँ से मिले, सहज स्वीकार : यदि किसी के विचार में प्रामाणिकता, तर्क और दम है, तो उसे सहर्ष स्वीकार करने की उदारता होनी चाहिए। यह सोचना कि 'यह विचार मेरा नहीं है, इसलिए नहीं मानूँगा'—अज्ञानता है। सत्य चाहे किसी बच्चे से मिले, ग्रंथ से, पंथ से या अन्य संत से, उसे सहज भाव से ग्रहण करना ही प्रज्ञावान होने का लक्षण है।
3. 'कीचड़ में हीरा': स्रोत नहीं, सार देखें:
पूज्य प्रवर ने एक मार्मिक उदाहरण देते हुए समझाया कि यदि कीचड़ में हीरा पड़ा हो, तो समझदार व्यक्ति कीचड़ की उपेक्षा कर केवल हीरा उठा लेता है। ठीक वैसे ही, बात कहने वाले का पद या उम्र देखने के बजाय उसके 'तथ्य की महत्ता' को देखकर अच्छाई को अपनाना चाहिए।
4. वैचारिक उदारता ही वास्तविक 'अहिंसा':
बिना किसी ठोस कारण के दूसरों के विचारों का खंडन करना या उन पर आक्षेप लगाना अहिंसक व्यवहार नहीं है। वैचारिक अहिंसा का अर्थ है—दूसरों के दृष्टिकोण का सम्मान करना और असहमति होने पर भी बिना अपमान किए शालीनता से अपनी बात रखना।

''शासनमाता'' के प्रति वो अगाध विनय... और दिल्ली के नाम युवाचार्य श्री का महा-संदेश!..

दिल्ली के श्रावक समाज को संबोधित करते हुए युवाचार्यश्री महावीर कुमार जी ने आगामी चातुर्मास (2027) और मर्यादा महोत्सव के पावन अवसर पर संपूर्ण समाज को आध्यात्मिक रूप से सजग रहने की प्रेरणा दी।
पूज्य प्रवर के उद्बोधन के मुख्य मार्गदर्शक बिंदु: गुरु-विनय और संकल्प का अमर आदर्श:
१. संकल्प की पूर्णता : युवाचार्य श्री ने कहा की आचार्य प्रवर ने वर्ष 2022 में 'शासन माता' (साध्वीप्रमुखा जी) को दर्शन देने का जो पावन संकल्प लिया था, उसे एक लंबी पदयात्रा कर पूर्ण किया।
२. बड़ों के प्रति अनन्य विनय : इतने सर्वोच्च पद पर होने के बावजूद पूज्य गुरुदेव ने 'शासन माता' के प्रति जिस अगाध विनय और आदर भाव का परिचय दिया, वह पूरे धर्म संघ और मानव जाति के लिए सदियों तक प्रेरणा का स्रोत रहेगा।
३. ऐतिहासिक दृष्टि : युवाचार्य श्री ने इसे एक 'ऐतिहासिक घटना' बताते हुए संदेश दिया कि बुजुर्गों और बड़ों के प्रति हमारा दृष्टिकोण हमेशा पूर्ण आदर और समर्पण का होना चाहिए।
त्याग, व्रतारोहण और दीक्षा की प्रेरणा:
१. व्रतों का अंगीकार : युवा वर्ग और परिवारों में त्याग की चेतना जागृत कर श्रावक के बारह व्रतों को धारण करना।
२. अनगार धर्म (दीक्षा) का भाव : मुमुक्षु भाव की महिमा बताते हुए उन्होंने प्रेरित किया कि श्रावक अपने भीतर ऐसा उत्कृष्ट भाव विकसित करें कि इस जन्म में—या कम से कम आगामी जन्म में—वे साधु दीक्षा के पथ को अपना सकें।
कषाय-मुक्ति : 'हलुकर्मी' बनने का
अमर संदेश:
१. आंतरिक शुद्धि : क्रोध, मान, माया और लोभ (चारों कषायों) का शमन कर स्वयं को 'हलुकर्मी' (कर्मों से हल्का) बनाना।
२. मैत्री और अहिंसा : कषायों को कम करके ही भीतर सच्चा धर्म उतरेगा, जिससे जीवन की विवशता और तनाव समाप्त होंगे।
दिल्ली से सुदूर विश्व तक शांति का प्रसार:
१. अहिंसा के रंग में दिल्ली : आचार्य प्रवर के प्रवास से पूरा दिल्ली 'तेरापंथ', 'जैन धर्म', 'अहिंसा', 'मानवता' और 'शांति' के रंगों में रंग जाए।
२. युद्ध के माहौल में शांति वाणी : देश की राजधानी से गूंजने वाली आचार्य श्री की अहिंसक वाणी पूरे विश्व तक पहुंचे, ताकि वैश्विक अशांति और युद्ध के वातावरण में भी शांति और भाईचारे का निर्माण हो सके।