गुरुवाणी/ केन्द्र
आचार्य भिक्षु के दृष्टांतों में निहित है अणुव्रत और संयम का महान संदेश : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता, महातपस्वी युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में 'अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह' का गरिमापूर्ण शुभारंभ हुआ। अणुव्रत के प्रवर्तक आचार्यश्री तुलसी की ऐतिहासिक जन्मभूमि लाडनूँ के सुधर्मा सभा भवन में आयोजित मुख्य मंगल प्रवचन कार्यक्रम में पूज्यप्रवर ने 'अणुव्रत प्रेरणा दिवस' के अवसर पर चतुर्विध धर्मसंघ को ओजस्वी पाथेय प्रदान किया।
व्यवहार में धर्म का समावेश और आत्मा का हित–
१. साधु और गृहस्थ का आचरण: पूज्यप्रवर ने आगम के आलोक में सम्बोधित करते हुए फरमाया कि साधु का व्यवहार क्षमा, मार्दव, आर्जव और मुक्ति आदि धर्मों से परिपूर्ण होना चाहिए। साधु के साथ-साथ गृहस्थों का जीवन और व्यवहार भी धर्म से भावित होना अनिवार्य है।
२. प्रत्येक क्षेत्र में धर्म प्रभावित व्यवहार: आचार्यश्री ने रेखांकित किया कि कोई भी व्यक्ति चाहे वह राजनीति के क्षेत्र में हो, व्यवसाय, नौकरी, अध्यापन कार्य में हो अथवा न्यायाधीश या वकील हो—सभी क्षेत्रों में मनुष्य का व्यवहार धर्म से अनुप्राणित होना चाहिए। ऐसा होने से न केवल आत्मा का परम हित होता है, बल्कि व्यक्ति का आचरण भी अनुकरणीय बनता है। जब हमारा व्यवहार अच्छा होगा तो सामने वाले का व्यवहार भी हमारे प्रति स्वतः श्रेष्ठ हो जाएगा।
अणुव्रत का व्यापक रूप–
१. अणुव्रत की सर्वव्यापी सोच : पूज्यश्री ने फरमाया कि अणुव्रत-प्रवर्तक आचार्य श्री तुलसी ने जैन धर्म के 'अणुव्रत' शब्द को अत्यंत व्यापक रूप प्रदान किया, जिससे केवल जैन ही नहीं, बल्कि गैर-जैन (Non-Jain) भी इसके छोटे-छोटे नियमों को अंगीकार कर सकते हैं।
२. आचार्यों का ऐतिहासिक अवदान : पूज्यश्री ने फरमाया कि आचार्य तुलसी के अथक श्रम से अणुव्रत को विशाल वटवृक्ष का रूप मिला और इसके अनेक अंग, उपांग व शाखाएँ विकसित हुईं।
तत्पश्चात् आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी ने अहिंसा यात्रा के माध्यम से नैतिक मूल्यों के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। वर्तमान में हमने भी 'सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति' की संकल्प-त्रयी के रूप में अणुव्रत को निरंतर गति प्रदान करने का प्रयास किया है।
जन-जागरण का आह्वान और विद्यार्थियों द्वारा गीत संगान–
१. मानवतावादी आंदोलन और जन-जागरण : पूज्यश्री ने फरमाया कि आज अणुव्रत किसी एक समाज तक सीमित न रहकर व्यापक मानवतावादी आंदोलन बन चुका है। यह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज के हर वर्ग—विद्यार्थियों, शिक्षकों, न्यायालयों और जेलों तक पहुँचना चाहिए। गुरुदेव ने गुरुकुलवास और न्यारा (विहार) सभी स्थानों पर विराजमान साधु-साध्वियों व समणियों से इन सात दिनों में अधिकाधिक जन-जागरण करने का आह्वान किया।
२. गीत संगान व संकल्प स्वीकारण : कार्यक्रम में विभिन्न विद्यालयों के विद्यार्थी बड़ी संख्या में उपस्थित थे। पूज्य गुरुदेव ने अणुव्रत गीत का संगान किया, जिसमें विद्यार्थियों ने भी स्वर से स्वर मिलाया। पूज्यश्री ने उपस्थित जनसमूह और विद्यार्थियों को सद्भावपूर्ण व्यवहार, ईमानदारी का पालन और नशीले पदार्थों से दूर रहने के संकल्प स्वीकार करवाए।
विचार अभिव्यक्ति :
अणुव्रत विश्व भारती का सम्बोधन: कार्यक्रम में अणुव्रत विश्व भारती के अध्यक्ष प्रताप दूगड़ ने अपने विचार व्यक्त करते हुए अणुव्रत सप्ताह की कार्ययोजना पर प्रकाश डाला।