गुरुवाणी/ केन्द्र
'Technology' से परे 'Atmalogy' का विकास ही आत्म-साक्षात्कार का मार्ग’: आचार्यश्री महाश्रमण
सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति के प्रेरक युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की मंगल सन्निधि में आज प्रेक्षाध्यान दिवस का भव्य आयोजन हुआ। इस अवसर पर मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में 'उत्तरज्झयणाणि' आगम के आलोक में चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए महातपस्वी आचार्यश्री ने स्वाध्याय, ध्यान और अध्यात्म विद्या की महत्ता पर ओजस्वी मार्गदर्शन फरमाया।
स्वाध्याय-ध्यान का युगल और जयाचार्य का पावन स्मरण–
१. साधना के दो पूरक अंग : पूज्यश्री ने फरमाया कि साधना के क्षेत्र में स्वाध्याय और ध्यान दोनों का एक अद्भुत युगल है। स्वाध्याय का अपना विशेष महत्व है तो ध्यान की भी अपनी अनूठी उपयोगिता है। ये दोनों एक-दूसरे के परिपूरक बनकर साधक की आध्यात्मिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
२. जयाचार्य का साधना व प्रशासनिक पक्ष: पूज्यप्रवर ने आश्विन मास का उल्लेख करते हुए तेरापंथ धर्मसंघ के चतुर्थ पट्टधर परम पूजनीय प्रज्ञा पुरुष श्रीमद् जयाचार्य का स्मरण किया, जिनका जन्म आश्विन शुक्ल चतुर्दशी को हुआ था। जयाचार्य महान ज्ञानी, तत्त्ववेत्ता और दूरदर्शी महापुरुष थे। उन्होंने संघ की अनुशासन व्यवस्था सम्बंधी अनेक परिष्कार किए और नई मर्यादाओं व व्यवस्थाओं का सूत्रपात किया, इसलिए उन्हें धर्मसंघ का महान विधिवेत्ता भी कहा जा सकता है।
३. जीवन के अंतिम वर्षों की विशेष साधना: जयाचार्य श्री ने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में स्वयं को विशेष स्वाध्याय और ध्यान की साधना में नियोजित किया था। इस रूप में प्रेक्षाध्यान दिवस का गहरा सम्बंध जयाचार्य के साधना जीवन से भी जुड़ा हुआ है।
विपुल साहित्य का निर्माण: आचार्य महाप्रज्ञ जी ने प्रेक्षाध्यान से सम्बंधित जिस विपुल साहित्य की रचना की, वह आज भी दुनिया भर के साधकों के लिए प्रामाणिक संदर्भ और मार्गदर्शन का काम कर रहा है।
तीन असांप्रदायिक व लोक कल्याणकारी उपक्रम: पूज्यप्रवर ने रेखांकित किया कि तेरापंथ धर्मसंघ के तीन प्रमुख कार्यक्रम—अणुव्रत, प्रेक्षाध्यान और जीवन विज्ञान पूरी तरह असांप्रदायिक, सर्वजनहिताय और लोक कल्याणकारी हैं।
'आत्मलॉजी' पर बल, संस्थाओं की भूमिका व गीत संगान–
१. तकनीक बनाम अध्यात्म ('आत्मलॉजी'): पूज्यश्री ने फरमाया कि आज तकनीकी सुविधाओं के माध्यम से प्रेक्षाध्यान का प्रसार वैश्विक स्तर पर हो रहा है, किंतु मूल रूप से यह एक गहन अध्यात्म विद्या है। आधुनिक टेक्नोलॉजी केवल एक सपोर्ट (सहयोग) है, मूल रूप से हमारी अपनी अध्यात्म विद्या यानी 'आत्मलॉजी' बढ़नी चाहिए।
२. प्रेक्षाध्यान विकास में संलग्न संस्थाएँ: पूज्यश्री ने फरमाया कि जैन विश्व भारती अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साधना का प्रमुख केंद्र है। वर्तमान में जैन विश्व भारती का प्रेक्षा फाउंडेशन, प्रेक्षा इंटरनेशनल, अध्यात्म साधना केंद्र (दिल्ली) और प्रेक्षा अकादमी जैसी संस्थाएँ प्रेक्षाध्यान के वैश्विक विकास और उन्नयन में अपना निरंतर योगदान दे रही हैं।
३. गीत संगान व संरक्षण का आह्वान: कार्यक्रम के दौरान पूज्य आचार्यश्री ने स्वयं 'आत्म साक्षात्कार प्रेक्षाध्यान...' गीत का संगान किया। पूज्यश्री ने फरमाया कि प्रेक्षाध्यान हमारे धर्मसंघ का एक उत्कृष्ट उपक्रम है। इससे जुड़े चारित्रात्माएँ और साधक अपने परिश्रम, चिंतन व मंथन का योगदान देते रहें तथा इसके संरक्षण व विस्तार के प्रति हमेशा जागरूक रहें।
नव-मनोनीत अध्यक्ष की भावाभिव्यक्ति: प्रवचन के उपरांत जैन विश्व भारती के नव-मनोनीत अध्यक्ष गौरव मांडोत ने पूज्य आचार्यश्री के चरणों में अपनी भावपूर्ण अभिव्यक्ति प्रस्तुत की और संस्था के दायित्वों को निष्ठापूर्वक निभाने का संकल्प व्यक्त किया।
आचार्यश्री महाश्रमण जी के मुखारविंद से गुंजित हुआ 'प्रेक्षा ध्यान' का अमर संगीतमय संदेश!
आत्म-साक्षात्कार, प्रेक्षाध्यान के द्वारा ॥
स्वप्न हो साकार, इस अभियान के द्वारा ॥
१. आत्मना आत्मावलोकन, है यही दर्शन
अन्तरात्मा में सहज हो, सत्य का स्पर्शन।
क्षीण हो संस्कार, अन्तर्धान के द्वारा ॥
२. मानसिक संतुलन, जागृति और चित समाधि
निकट आती दूर जाती, व्याधि आधि उपाधि।
प्रेम का विस्तार, निज संधान के द्वारा ॥
३. बदल जाते हैं रसायन, ग्रन्थियों के स्राव
बदलते व्यवहार सारे, बदलते हैं भाव।
बदलता संसार, आनापन के द्वारा ॥
४. समस्या आवेग की है विकटतम जग में
आदतों की विवशता है, व्याप्त रग-रग में।
हो रहा उपचार, इस अवदान के द्वारा ॥
५. अनुप्रेक्षा और लेश्या,ध्यान कायोत्सर्ग
श्वास-प्रेक्षा से धरा पर, उतर आए स्वर्ग
हृदय हो अविकार के वल ज्ञान के द्वारा।
हृदय हो अविकार ‘तुलसी’ ज्ञान के द्वारा।
लय – मेरा जीवन कोरा
जयपुर का वह चतुर्मास, जहाँ रचा गया ध्यान का महा-विज्ञान!
1. आचार्यश्री तुलसी की निश्रा व नवीन उन्मेष : आचार्यश्री महाश्रमण जी ने फरमाया कि प्रेक्षा ध्यान का शुभारंभ नवम अधिशास्ता आचार्य श्री तुलसी के कालखंड में हुआ। उनके नेतृत्व में धर्मसंघ में अनेक क्रांतिकारी प्रयोग आए, जिनमें प्रेक्षा ध्यान का प्रादुर्भाव एक ऐतिहासिक कड़ी है।
2. ऐतिहासिक नामकरण: जयपुर (वि. सं. 2032) विक्रम संवत 2032 के चतुर्मास में जयपुर की धरा पर इस पद्धति का नामकरण 'प्रेक्षा ध्यान' हुआ और इसे एक वैज्ञानिक तथा सुव्यवस्थित साधना-पद्धति के रूप में स्थापित किया गया।
3. आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी: मुख्य आधार स्तंभ: आचार्यश्री महाश्रमण जी ने स्पष्ट किया कि यद्यपि शुभारंभ आचार्य तुलसी की निश्रा में हुआ, किंतु इसे वैज्ञानिक पद्धति के रूप में विकसित करने का संपूर्ण श्रेय आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी को जाता है। पूज्य प्रवर ने उन्हें इस साधना का 'माता-पिता' व मुख्य आधार स्तंभ बताया।
4. प्रायोगिक साधना व 'ध्वनि प्रयोग': आचार्य महाप्रज्ञ जी ने 'ध्वनि प्रयोग' व सूक्ष्म ध्यान-तकनीकों को वैज्ञानिक ढंग से विकसित किया। उनके गहरे शोध, प्रयोगात्मक दृष्टिकोण और सरल भाषा ने ही इस प्राचीन ध्यान पद्धति को जन-जन तक पहुँचाया।