शिक्षा-संस्कार के पुरोधा थे कालूगणी

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उत्तर हावड़ा।

शिक्षा-संस्कार के पुरोधा थे कालूगणी

युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि जिनेश कुमार जी ठाणा - 3 के सान्निध्य में आचार्यश्री कालूगणी का 91वां स्वर्गवास दिवस उत्तर हावड़ा श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा द्वारा योगक्षेम विहार के योगक्षेम सभागार में आयोजित हुआ। इस अवसर पर उद्बोधन प्रदान करते हुए मुनि जिनेश कुमार जी ने कहा - तेरापंथ धर्मसंघ के अष्टमाचार्य कालूगणी निस्पृह साधक थे। वे महाप्रतापी, पुण्यशाली, परोपकारी, आत्मार्थी, पापभीरु, आचारनिष्ठ व स्वाभिमानी व्यक्तित्व के धनी थे। उनकी सादगी, रहन-सहन, फक्कड़ वृत्ति संतता का बोध कराने वाली थी। उनके शासनकाल में बालसाधु - साध्वियों की वृद्धि हुई। वे शिक्षा और संस्कार पर विशेष ध्यान देते थे। उनका जीवन स्वस्थ एवं स्पष्ट था। उनके शासनकाल के दीक्षित दो मुनि आचार्य तुलसी व आचार्य महाप्रज्ञ धर्मसंघ के प्रभावशाली आचार्य बने। मुनि ने आगे कहा - परमपूज्य कालूगणी का जन्म छापर में व दीक्षा मघवागणी के द्वारा हुई। वे मघवागणी के कृपापात्र थे। गुरुदृष्टि की आराधना करते हुए उन्होंने चऊंमुखी विकास किया। वे आज के दिन गंगापुर में महाप्रयाण को प्राप्त हुए। उनके 91वें महाप्रयाण दिवस पर श्रद्धासिक्त स्मरण करते हुए अपनी भावांजलि अर्पित करते हैं। मुनि परमानंद ने परमपूज्य कालूगणी को शिक्षाप्रेमी बतलाया। मुनि कुणाल कुमार ने सुमधुर गीत प्रस्तुत किया।