‘Is Your Investment A Real Investment?’

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केसिंगा।

‘Is Your Investment A Real Investment?’

स्थानीय तेरापंथ भवन, केसिंगा युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी के सुशिष्य मुनि हिमांशु कुमार जी एवं मुनि हेमंत कुमार जी के पावन सान्निध्य में व्यक्तित्व एवं जीवन विकास से जुड़े महत्वपूर्ण विषय ‘Is Your Investment A Real Investment?’ पर एक विशेष कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में प्रतिभागियों को पारंपरिक निवेश से आगे बढ़कर स्वयं की क्षमताओं, ज्ञान, व्यक्तित्व एवं गुणों में निवेश करने की प्रेरणा दी गई। कार्यशाला की प्रशिक्षक दीपिका फुलफूगर (मदुरई) थीं। कार्यशाला की शुरुआत एक सहज लेकिन विचारणीय प्रश्न से हुई—यदि हमारे पास कुछ अतिरिक्त धनराशि उपलब्ध हो, तो हम उसका निवेश कहां करेंगे? इस प्रश्न पर प्रतिभागियों ने अपने-अपने विचार साझा किए। किसी ने गोल्ड में निवेश को उपयोगी बताया, तो किसी ने फिक्स्ड डिपॉजिट, जमीन-जायदाद, शेयर मार्केट आदि को बेहतर विकल्प बताया। प्रतिभागियों की प्रतिक्रियाओं से स्पष्ट हुआ कि सामान्यतः निवेश का अर्थ हमारे मन में धन को ऐसी जगह लगाना होता है, जहां भविष्य में उसका मूल्य बढ़ सके। इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कार्यशाला के मूल विषय की ओर प्रतिभागियों का ध्यान आकर्षित किया—क्या हम केवल धन को बढ़ाने के बारे में सोचते हैं, या स्वयं को बेहतर बनाने के लिए भी निवेश करते हैं? उन्होंने समझाया कि जीवन में सबसे महत्वपूर्ण निवेश केवल बैंक, बाजार, सोना अथवा संपत्ति में किया गया निवेश नहीं है, बल्कि स्वयं की क्षमताओं और व्यक्तित्व में किया गया निवेश भी उतना ही महत्वपूर्ण है। धन का निवेश हमें आर्थिक रूप से मजबूत बना सकता है, लेकिन ज्ञान, कौशल, आत्मविश्वास, अनुशासन, संवाद-कौशल और सकारात्मक सोच में किया गया निवेश व्यक्ति को जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में सक्षम बनाता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी आय का एक छोटा हिस्सा किसी नई स्किल को सीखने, किसी अच्छे कोर्स में भाग लेने, किताबें पढ़ने अथवा अपने स्वास्थ्य और व्यक्तित्व के विकास पर खर्च करता है, तो उसका लाभ लंबे समय तक प्राप्त हो सकता है। इसी प्रकार प्रतिदिन कुछ समय पढ़ने, नई भाषा सीखने, बेहतर संवाद करने, तकनीक समझने या अपनी किसी कमजोरी पर काम करने में लगाया गया समय भी वास्तव में स्वयं पर किया गया निवेश है। कार्यशाला में इस बात पर भी जोर दिया गया कि प्रत्येक व्यक्ति के भीतर कोई न कोई विशेष क्षमता या ‘स्ट्रेंथ’ मौजूद होती है। आवश्यकता इस बात की है कि व्यक्ति अपनी उस क्षमता को पहचाने, उस पर समय लगाए और उसे निरंतर विकसित करे। जैसे कोई व्यक्ति अच्छा वक्ता बनने की क्षमता रखता है, लेकिन यदि वह बोलने का अभ्यास नहीं करता तो उसकी वह क्षमता सीमित ही रह जाएगी। वहीं नियमित अभ्यास, अध्ययन और मंच पर बोलने के अवसर उसके आत्मविश्वास और प्रभावशीलता को कई गुना बढ़ा सकते हैं। मुनिश्री ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि व्यक्ति के पास कितनी संपत्ति है, यह महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ यह भी महत्वपूर्ण है कि उस संपत्ति का सदुपयोग किस प्रकार किया जा रहा है और स्वयं के निर्माण में कितना निवेश किया जा रहा है।