रचनाएं
नवरात्रि अनुष्ठान व्यक्ति को ऊर्जावान बनाता है
तेरापंथ धर्मसंघ एक प्राणवान संघ है। इस धर्मसंघ में युगानुकूल आचार्य प्राप्त होते रहे हैं, जिससे धर्मसंघ उत्तरोत्तर विकासोन्मुख दिखाई दे रहा है। तेरापंथ संघ के प्रथम आचार्य भिक्षु हुए, जिन्होंने 'एक गुरु एक विधान' की जो व्यवस्था दी, वह सैकड़ों वर्षों के बाद भी व्यवस्थित चल रही है। इसी कारण धर्मसंघ का वर्चस्व बढ़ रहा है।
सैकड़ों साधु-साध्वी और लाखों श्रावक-श्राविका होते हुए भी सब गुरु-आज्ञा को ही जीवन-विकास का माध्यम मानते हैं। गुरु द्रव्य-क्षेत्र-काल-भाव के ज्ञाता होते हैं। वे युगानुरूप धर्मसंघ में नये-नये आयामों का आविष्कार करते रहते हैं। हर आयाम अहिंसा, संयम, तप को बढ़ाने वाले होते हैं। उन अनेक आयामों में एक आयाम है — नवरात्रि अनुष्ठान। आचार्यश्री तुलसी और आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी, दोनों ही प्रयोगधर्मा आचार्य हुए हैं। उन्होंने प्रवचनों के साथ प्रयोग प्रारंभ किये जिससे जीवन-रूपांतरण हो सके। प्रेक्षाध्यान, जीवन-विज्ञान हो या नवरात्रि अनुष्ठान, ये सब प्रायोगिक हैं। नवरात्रि पर्व पर अक्सर देवी-अनुष्ठान का क्रम लंबे समय से चलता आ रहा है। उसमें धूप, दीप, फल, फूल की ही नहीं, पशुबलि का क्रम भी चलता है। पूज्य गुरुदेव का चिंतन था कि जैन धर्म अहिंसा प्रधान धर्म है। जैन लोग पशुबलि तो अक्सर नहीं करते, परंतु फल, फूल, धूप, दीप की भी हिंसा क्यों करें? हमारे धर्म में अनेक मंत्र हैं, उनका स्मरण-जाप किया जाये। विविध प्रकार की तपस्याएँ हैं, उनका प्रयोग किया जाये जिससे हिंसा से बचाव हो सके। गुरुदेव ने एक व्यवस्थित अनुष्ठान का प्रारूप बनाया ही नहीं, उसका उन्होंने प्रयोग भी प्रारंभ किया। नवरात्रि के इस अनुष्ठान का सामूहिक प्रयोग चलता है। उसमें सैकड़ों लोग सहभागी बन रहे हैं। आचार्य श्री महाश्रमण जी स्वयं प्रवचन में ही नहीं, अन्य समय पर भी सामूहिक प्रयोग करवाते हैं। यह प्रयोग शुद्ध आध्यात्मिक है। अहिंसा, संयम और तप को बढ़ाने वाला है। इससे कर्मों की निर्जरा होती है। कर्म-निर्जरा आत्म-शुद्धि का उपाय है। जैसे-जैसे कर्मों की निर्जरा होगी, व्यक्ति स्वतः ऊर्जा-संपन्न बन जाएगा।