अणुव्रत है यूनिवर्सल धर्म, व्यक्ति सुधार से ही संभव है राष्ट्र सुधार

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अणुव्रत है यूनिवर्सल धर्म, व्यक्ति सुधार से ही संभव है राष्ट्र सुधार

अणुव्रत विश्व भारती सोसायटी के निर्देशन में अणुव्रत समिति ग्रेटर सूरत द्वारा 1 अक्टूबर से 7 अक्टूबर तक आयोजित किए जा रहे अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के अंतर्गत तृतीय दिवस को तेरापंथ भवन, सिटी लाइट में ‘सांप्रदायिक सौहार्द दिवस’ के रूप में मनाया गया। कार्यक्रम का आयोजन अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी के विद्वान शिष्य मुनि डॉ. मदन कुमार जी के पावन सान्निध्य में हुआ जिसमें विविध धर्म के धर्मगुरु या धर्म प्रवक्ता विशेष रूप से सनातन धर्म के पंडित राम प्रताप शुक्ला (चित्रकूट), ब्रह्माकुमारी से ब्रह्माकुमारी अवनी बहन, ईसाई संप्रदाय से फादर डेनिस एलविश एमिस, मुस्लिम संप्रदाय से सूफी संत एम.ए. चिश्ती साहब, पारसी संप्रदाय से डॉ. मीनू परबिया साहब, आदि उपस्थित रहे एवं 'सामाजिक-राष्ट्रीय विकास में सांप्रदायिक एकता की महत्ता' पर अपने विचारों को प्रस्तुत किया।
मुनि श्री ने अपने मुख्य सानिध्यीय संबोधन में कहा कि सांप्रदायिक सौहार्द के बिना सामाजिक विकास संभव नहीं है। अणुव्रत प्रवर्तक आचार्यश्री तुलसी ने यूनिवर्सल धर्म - अणुव्रत प्रस्तुत किया, जो संयम, नैतिकता और मानवीय मूल्यों पर आधारित है। आचार्य तुलसी का अमर संदेश था—‘इंसान पहले इंसान, फिर हिंदू या मुसलमान’। उन्होंने आगे कहा कि व्यक्ति सुधार से ही समाज और राष्ट्र का सुधार संभव है।
(प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय):
अवनी बहन ने कहा कि हमारा भीतरी स्वरूप आत्मा है, जो चैतन्य स्वरूप है। शांति और प्रेम ही आत्मा का सच्चा स्वधर्म है। सुख, शांति, प्रेम, आनंद, ज्ञान, पवित्रता और शक्ति—ये आत्मा के सात निजी गुण हैं। जब हम इन गुणों को आत्मसात कर लेते हैं, तो आंतरिक व बाहरी अशांति समाप्त हो जाती है। हम सभी एक निराकार ईश्वर की संतान हैं; आत्मिक धरातल पर न कोई स्त्री है, न पुरुष, न हिंदू और न मुसलमान। सभी मनुष्य एक समान है।
पंडित रामप्रताप जी शुक्ला (चित्रकूट - सनातन धर्म):
पंडित जी ने कहा कि इस संसार में समस्त मानव एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। हमें एक गुलदस्ते की भांति मिल-जुलकर रहना चाहिए और आपसी भाईचारे को सुदृढ़ करना चाहिए। दूसरों को सुधारने के बजाय स्वयं को सुधारने का प्रयास करना श्रेयस्कर है। जब हम यह चाहते हैं कि कोई हमें न सताए, तो हमें भी दूसरों को किसी प्रकार का कष्ट नहीं पहुंचाना चाहिए। अपनी कमियों को दूर करने से ही जीवन सार्थक बनता है।
फादर डेनिस एल्विस एमिस (ईसाई संप्रदाय):
फादर डेनिस ने कहा कि वर्तमान में सांप्रदायिकता का दुरुपयोग लोगों के मन में घृणा फैलाने के लिए किया जा रहा है। बाइबिल की सीख का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमें अनुशासन और शासन चलाने वालों के लिए प्रार्थना करनी चाहिए ताकि सब शांतिपूर्ण जीवन जी सकें।
डॉ. मीनू परबिया (पारसी संप्रदाय):
डॉ. परबिया ने पारसी धर्म के तीन मूलभूत सिद्धांतों—मन, वचन और कर्म की शुद्धि पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि मनुष्य धन कमाए, लेकिन व्यापार और व्यवहार में प्रामाणिकता व ईमानदारी अवश्य रखे।
सूफी संत एम. ए. चिश्ती साहब (मुस्लिम संप्रदाय):
चिश्ती साहब ने कहा कि वर्तमान समय में जब विश्व में अशांति और हिंसा का वातावरण है, तब मुनि श्री और अणुव्रत समिति द्वारा शांति का यह दीप जलाना अत्यंत सराहनीय व वंदनीय कार्य है। सूफी संत सदैव पैगंबर साहब के अमन और भलाई के संदेश को आगे बढ़ाते हैं। अशांति का मुख्य कारण नकारात्मक दृष्टिकोण है, जबकि ईश्वर की रहमत सभी के लिए समान है। बाबा फरीद के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि हमें कैंची नहीं, सुई बनना चाहिए—जो काटने का नहीं, बल्कि दिलों को जोड़ने का कार्य करे। 32 दांतों के बीच जीभ की तरह हमें लचीलापन अपनाना चाहिए और कट्टरपंथ व हिंसा से दूर रहना चाहिए। भारत रूपी विशाल जहाज की रक्षा करना हम सभी की साझी जिम्मेदारी है।
मुनि संयम कुमार जी एवं मुनि कल्प कुमार जी उपस्थित रहे। अणुव्रत समिति ग्रेटर सूरत के अध्यक्ष रत भलावत ने अणुव्रत आचार संहिता का वाचन किया एवं अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए पधारे हुए सभी धर्म गुरु / धर्म प्रवक्ताओं का स्वागत किया। कार्यक्रम का कुशल एवं प्रभावी संचालन 'अणुव्रत सेवी' एवं उपासक अर्जुन मेड़तवाल ने किया।