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क्षमा और मैत्री से ही संभव है सौहार्दपूर्ण समाज
भारत की राजधानी दिल्ली के विज्ञान भवन में भगवान महावीर मेमोरियल समिति एवं जैन महासभा, दिल्ली के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ‘विश्व मैत्री एवं क्षमापना दिवस’ समारोह में भारत के उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन जी की गरिमामयी उपस्थिति रही। समारोह में बहुश्रुत मुनि उदित कुमारजी ने अणुव्रत भवन से लगभग ४ किमी का विहार कर विज्ञान भवन पहुंचकर अपना मंगल सान्निध्य प्रदान किया। इस अवसर पर पंजाब के राज्यपाल गुलाबचंद कटारिया , भगवान महावीर मेमोरियल समिति के अध्यक्ष कन्हैया लाल जैन, जैन महासभा, दिल्ली के अध्यक्ष दिनेश दोषी जी सहित विभिन्न जैन परंपराओं के संत आचार्य श्री १०८ विशुद्ध सागरजी मुनिराज, उपाध्याय श्री रविंद्र मुनि जी एवं मुनिश्री तीर्थ निर्वाण विजय जी का भी सान्निध्य रहा।
अपने प्रेरक उद्बोधन में बहुश्रुत मुनि उदित कुमारजी ने कहा कि जीवन में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन मनभेद नहीं होना चाहिए। विचारों में भिन्नता होना स्वाभाविक है, किंतु विचारों की भिन्नता को मन की दूरी नहीं बनने देना चाहिए। क्षमा और मैत्री ऐसी भावनाएं हैं, जो व्यक्ति से व्यक्ति को जोड़ती हैं तथा समाज में सौहार्द और आत्मीयता का वातावरण निर्मित करती हैं। मुनिश्री ने कहा कि क्षमा केवल शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि मन की निर्मलता का भाव है। जब हम अपने भीतर की कटुता और गांठों को समाप्त करते हैं, तभी वास्तविक मैत्री का विकास होता है। क्षमापना का भाव पर्व विशेष तक सीमित न रहकर हमारे दैनिक जीवन एवं व्यवहार का हिस्सा बने—यही इसकी सार्थकता है। उपराष्ट्रपति श्री सी. पी. राधाकृष्णन जी ने अपने संबोधन में क्षमा, अहिंसा एवं मैत्री के सार्वभौमिक संदेश को रेखांकित करते हुए इसे वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक बताया। संचालन सुनीता जैन ने किया।