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आयम्बिल तप से सौ करोड़ वर्षों के अशुभ कर्म क्षीण होते हैं
श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, रोहिणी में युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी की सुशिष्या शासनश्री साध्वी सुमनश्री जी के सान्निध्य में आयम्बिल नवपद अनुष्ठान सम्पन्न हुआ। आयम्बिल अनुष्ठान में 55 भाई-बहिनों ने भाग लिया। साध्वी श्री जी ने प्रवचन के दौरान नव-पद का विधिवत जप करवाय मैंना सुन्दरी और श्रीपाल का ऐतिहासिक प्रसंग सुनाते हुए कहा कि जैन परम्परा में आयम्बिल का बहुत महत्व बताया गया है। द्वारिका नगरी जब तक यह तय चला सुरक्षित रही। यह स्वादविजय की साधना है। पांच इन्द्रियों में जिहवा पर कंट्रोल रखना कठिन साधना है। आयम्बिल तप से सौ करोड़ वर्षों के अशुभ कर्म क्षीण होते है। वैसे इस महिने में आयम्बिल तप से स्वास्थ्य की दृष्टि से भी हितकर बताया गया है। आश्विन का महिना रक्त परिवर्तन का मौसम माना गया है प्रकृति में इस समय कुछ बदलाव होता है। ऐसे समय में खान-पान पर कंट्रोल हो तो सहज होने वाले दुष्प्रभावों से बचा जा सकता है। जैन धर्म में तप के कई प्रकार है जिनमे आयम्बिल तप करना अपने आप में कठिन साधना है। साध्वी श्री जी ने यह भी बताया कि नवपद का विधिवत जप सोने में सुहागा है। बहुत भाइयों ने तो पहली बार यह आयम्बिल किया ओर कइयों ने पूरे परिवार सहित तप-जय में सम्भागी बने। साध्वी सुरेखा जी, साध्वी मधुर लताजी ने अति श्रम से सबको प्रेरणा देकर इस अनुष्ठान में सम्भागी बनाया ।