'स्वर्ग की चाह नहीं, मोक्ष की राह ही संथारे का सच्चा मर्म' : आचार्यश्री महाश्रमण

गुरुवाणी/ केन्द्र

लाडनूं। 12 अक्टूबर, 2026

'स्वर्ग की चाह नहीं, मोक्ष की राह ही संथारे का सच्चा मर्म' : आचार्यश्री महाश्रमण

जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी अपनी पावन वाणी से चतुर्विध धर्मसंघ में आध्यात्मिक ऊर्जा प्रवाहित कर रहे हैं। मुख्य मंगल प्रवचन में गुरुदेव ने नवान्हिक आध्यात्मिक अनुष्ठान का क्रम संपन्न करवाया। तत्पश्चात् निर्धारित विषय ‘भक्त प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?’ पर आगम के माध्यम से अपनी अमृत देशना प्रदान करते हुए आचार्यश्री महाश्रमण जी ने चतुर्विध धर्मसंघ को सम्बोधित किया।
अनशन का स्वरूप, भेद एवं 'भक्त प्रत्याख्यान' का महिमामंडन–
१. अनशन के प्रकार व मरण समाधि : आचार्यश्री ने फरमाया कि भक्त प्रत्याख्यान का अर्थ है आहार का प्रत्याख्यान कर देना। भोजन की आवश्यकता साधुओं और गृहस्थों दोनों को ही होती है, परन्तु साधु और गृहस्थ दोनों ही भक्त प्रत्याख्यान करते हैं। हमारे धर्मसंघ के आद्य आचार्यश्री भिक्षु ने अनशनपूर्वक पंडित मरण को प्राप्त किया था। जैन शासन में अनशन का विशेष महत्त्व है। अनशन दो प्रकार का होता है—
१. इत्वरिक (अर्थात् निश्चित समय के लिए) और २. यावत्कथित (अर्थात् जीवनभर के लिए)।
२. जीवन भर के अनशन के तीन प्रकार व उनकी श्रेणियाँ: जीवनभर के अनशन के तीन प्रकार बतलाए गए हैं—भक्त प्रत्याख्यान, इंगिनीमरण और पादोपगमन। इनमें यदि भक्त प्रत्याख्यान को विशिष्ट मान लें तो इंगिनी मरण विशिष्टतर और पादोपगमन विशिष्टतम अनशन होता है। प्रायोपगमन अथवा पादोपगमन में साधक निश्चेष्ट होकर स्थित हो जाता है, यह बहुत उच्च कोटि का अनशन है।
३. भव भ्रमण का परिसीमन : शास्त्र में भक्त प्रत्याख्यान का आश्चर्यकारी लाभ बताया गया है कि यह सैकड़ों भवों का निरोध कर देता है। संथारे से जीव को भव भ्रमण से मुक्ति मिल जाती है। आहार का त्याग कर देने से भीतर के अध्यवसायों में ममत्व मुक्ति का भाव आ जाने से भव भ्रमण का परिसीमन हो जाता है।
अपश्चिम मारणांतिक संलेखना और जीवन-संध्या का पाथेय–
१. तीसरा मनोरथ व मोक्ष भावना : चारित्रात्माओं और श्रावकों दोनों का तीसरा मनोरथ ‘अपश्चिम मारणांतिक संलेखना’ समान है। मन में यह भाव रहे कि अनशन की अवस्था में ही प्राण व्युत्सर्ग हों। कोई बाह्य आकर्षण जैसे देवलोक आदि की कामना न हो, एकमात्र मोक्ष की भावना ही मन में रहे।
२. जीवन-संध्या का नियोजन : यह भी संभव है कि संथारा लेने का मौका न मिले, अतः अंतिम समय जैसे ७० या ८० की उम्र में गृहस्थ हो या साधु, अपने आप को धर्म साधना में नियोजित करने का प्रयास करें। भावों की शुद्धि रहे और संवर व निर्जरा की साधना खूब अच्छी चले।
३. वृद्धावस्था व गृहस्थों का चिंतन : वृद्धावस्था की स्थिति में जब शरीर कमजोर हो जाए तो अपना समय धर्म-ध्यान में लगाने का प्रयास करें। गृहस्थों का यह चिंतन रहे कि अधिक से अधिक त्याग प्रत्याख्यान करें, सामायिक करें। परिग्रह का अल्पीकरण, चोरी का त्याग, झूठ बोलने का जितना संभव हो सके त्याग करने का प्रयास करना चाहिए।
'संघ परामर्शक' मुनि मधुकरजी स्वामी का स्मरण एवं तप प्रत्याख्यान–
१. मुनि मधुकरजी स्वामी को श्रद्धांजलि: आचार्य प्रवर ने आगे फरमाया कि आज आश्विन शुक्ला द्वितीया है और मुनि मधुकरजी स्वामी के प्रयाण की वार्षिक तिथि है। मुनि मधुकरजी स्वामी हमारे धर्मसंघ के विशिष्ट मुनि रहे हैं। मुनिश्री ने गुरुदेव तुलसी की सेवा में अपना जीवन समर्पित किया था पूज्यश्री ने उनकी स्मृति करते हुए मंगलकामना की कि मुनिश्री की आत्मा जहाँ भी हो, खूब शांति और समाधि में रहे और जल्दी ही मोक्ष श्री का वरण करे।
२. तप प्रत्याख्यान : साध्वी स्मितप्रभा जी ने पूज्य गुरुदेव के श्रीमुख से २८ दिनों की तपस्या (मासखमण) का प्रत्याख्यान ग्रहण कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

"निष्काम साधना, अनन्य सेवा और अक्षुण्ण गुरु-भक्ति के अमर प्रतीक: 'शासनगौरव' मुनिश्री मधुकरजी स्वामी":
आश्विन शुक्ला द्वितीया : स्मरण का दिवस : पूज्य आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपने पावन प्रवचन में फरमाया कि आश्विन शुक्ला द्वितीया का यह दिवस 'शासनगौरव' मुनिश्री मधुकरजी स्वामी के काल-धर्म की 18वीं वार्षिक पुण्यतिथि का है। इस अवसर पर संघ के प्रति उनके अप्रतिम योगदान और महान अवदानों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
गुरु-सेवा का असाधारण और सूक्ष्म समर्पण : मुनिश्री मधुकरजी ने युगदृष्टा आचार्यश्री तुलसी के सानिध्य में रहकर वर्षों तक ऐसी निष्काम और निस्पृह सेवा की, जिसकी मिसाल मिलना दुर्लभ है। उनके सेवा-दायित्वों का दायरा अत्यंत व्यापक और सूक्ष्म था–
१. प्रतिलेखन और बौद्धिक सहयोग: गुरुदेव के पवित्र प्रतिलेखन कार्यों में पूरी तल्लीनता से सहयोग करना।
२. गोचरी व पंचमी समिति प्रबंधन : पंचमी समिति में साथ रहकर पात्रों की देखभाल और गोचरी से जुड़ी तमाम व्यवस्थाओं को बेहद कुशलता से संभालना।
३. चिकित्सा और स्वास्थ्य का रिकॉर्ड : गुरुदेव के स्वास्थ्य और चिकित्सा संबंधी रिकॉर्ड (डायरी) को अत्यंत सटीकता और गोपनीयता के साथ सहेजना।
४. व्यक्तिगत व रात्रि परिचर्या : सुबह-शाम शारीरिक सेवा (जैसे मालिश आदि) तो करना ही, साथ ही रात्रि के समय भी गुरुदेव के समीप रहकर उनकी हर आवश्यकता के लिए तत्पर रहना।
द्विविध आचार्यों की सान्निध्य-सेवा का दुर्लभ सौभाग्य:
मुनिश्री मधुकरजी का जीवन इस बात का प्रतीक है कि निष्काम सेवा करने वाले संतों पर गुरुओं की असीम कृपा बरसती है। उन्हें न केवल आचार्यश्री तुलसी की लंबी सेवा का सौभाग्य मिला, बल्कि उनके महाप्रयाण के पश्चात आचार्यश्री महाप्रज्ञ को भी आहार कराने और उनकी सेवा करने का अप्रतिम अवसर प्राप्त हुआ। दो युग-प्रवर्तक आचार्यों के सानिध्य में ऐसी सेवा का सुयोग उनके महान व्यक्तित्व को और ऊँचाई देता है।
'संघ परामर्शक' से लेकर 'शासन गौरव' तक का मान:
"मुनिश्री के इस अप्रतिम सेवा-समर्पण और शासन-निष्ठा के प्रति गहरा बहुमान व्यक्त करते हुए"–
आचार्यश्री तुलसी ने उन्हें 'संघ परामर्शक' के गरिमापूर्ण पद से अलंकृत किया।
तत्पश्चात, आचार्यश्री महाप्रज्ञ जी ने उनके सेवा-कार्यों और शासन के प्रति अद्वितीय योगदान को देखते हुए उन्हें 'शासन गौरव' के उच्च अलंकरण से सम्मानित किया।
नवदीक्षित संतों के प्रेरणा-स्रोत: मुनिश्री मधुकरजी स्वामी केवल सेवा की मूरत नहीं थे, बल्कि वे अनुशासन और प्रशिक्षण के जीवंत विद्यालय थे। उनके सानिध्य में कई नवदीक्षित संतों को संघ के उच्च संस्कारों, कार्यकुशलता और सेवा का व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त हुआ। उनका मृदुतामय व्यवहार और हर परिस्थिति में स्थितप्रज्ञ रहना सभी के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा।

"शारद के चंद्र-सी सौम्यता और गुरु-चरणों में सर्वस्व अर्पण करने वाले 'शासनगौरव' मुनिवर श्री मधुकरजी स्वामी के प्रति पूज्य आचार्यप्रवर की वाणी से प्रस्रवित यह मंगल आशंसात्मक रसाग्र काव्य-पुष्प" :
मुनिवर मधुकर स्वाम गण में गौरव पाया जी।
कविवर मन अभिराम गुरुवर रे मन भाया जी।।
संघ परामर्शक संबोधन गुरु तुलसी मुख उक्त।
महाप्रज्ञ गुरु दत्त विभूषण शासनगौरव युकत।।१।।
खूब करी गुरुवर री सेवा अर्पित तन मन प्राण।
गुरु सेवा ने जप-तप मान्यो निज कर्त्तव्य सुजाण।।२।।
नवदीक्षित संतां री सेवा विपुल करी दिनरात।
सुसंस्कार भर्या जीवन में कांई बताऊं बात।।३।।
मृदुतामय व्यवहार कुशलता आकर्षण रो केन्द्र।
हंसतो-खिलतो गमतो चेहरो ज्यूं शारद रो चन्द्र।।४।।
स्थितप्रज्ञ रह करो निरंतर शांतसुधारस पान।
'महाश्रमण' मंगल आशंसामय म्हारो संगान।।५।।
लय – मांड....

"न कोई खड़को, न कोई आवाज़... गुरुदेव तुलसी रे विश्राम में कुण बाँध दी छाना-माना पट्टी?"
बहुश्रुत मुनिश्री दिनेशकुमार जी ने सवाई माधोपुर प्रवास का एक अत्यंत प्रेरक संस्मरण साझा करते हुए मुनिश्री मधुकर जी स्वामी की निस्वार्थ सेवा-निष्ठा, सूझबूझ और अनन्य गुरु-भक्ति को रेखांकित किया।
१. सवाई माधोपुर का प्रसंग : गुरुदेव आचार्यश्री तुलसी के पैर में चोट लगी थी और पट्टी करना आवश्यक था। दोपहर के आहार के बाद जब गुरुदेव विश्राम कर रहे थे, तब मुनि श्री मधुकर जी अत्यंत शांति और कुशलता से वहाँ पहुँचे। उन्होंने इतनी सहजता से पट्टी की कि गुरुदेव को विश्राम के दौरान इसका आभास तक नहीं हुआ।
२. गुरुदेव तुलसी का आश्चर्य : जब गुरुदेव की नींद खुली और पैर पर बँधी पट्टी देखी, तो वे आश्चर्यचकित रह गए। पूछने पर जब पता चला कि यह कार्य मुनि मधुकर जी का है, तो गुरुदेव उनकी मौन, चतुर और निष्काम सेवा-भावना से अभिभूत हो उठे।
३. आचार्य महाश्रमण जी के साथ दीक्षा-काल के स्मृति-शेष : मुनि दिनेशकुमार जी ने अपने दीक्षा-काल को याद करते हुए बताया कि दीक्षा लेते ही उन्हें मुनि मधुकर जी के उसी वर्ग (ग्रुप) में रहने का दुर्लभ सुयोग मिला, जिसके एक सदस्य स्वयं वर्तमान अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी भी थे।
४. संस्कृत में ज्ञान-चर्चा और स्मृतियाँ: मुनि दिनेशकुमार जी, मुनि जिनेशकुमार जी और धर्मरुचि स्वामी एक साथ मुनि मधुकर जी के पास आए थे। उन्होंने याद किया कि उस दौरान गुरुदेव और मुनि मधुकर जी के बीच अक्सर संस्कृत में गंभीर वार्तालाप होता था, जिसे सुनना भी अपने आप में एक महान अनुभव था।
मुनि श्री दिनेशकुमार जी ने भावुक होकर कहा कि मुनि मधुकर जी के गुणों का जितना बखान किया जाए, उतना कम है।
सार संदेश : "सच्ची सेवा वह है जो बिना किसी शोर-शराबे के केवल गुरु-चरणों में समर्पित हो जाए—और मुनि मधुकर जी इसी निष्काम सेवा के अनूठे प्रतीक थे।"