गुरुवाणी/ केन्द्र
'समता की भावना से ही सधता है शांतिमय और आनंदमय जीवन’ : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन विश्व भारती, लाडनूँ में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, अहिंसा यात्रा प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमण जी ने मुख्य प्रवचन कार्यक्रम में निर्धारित विषय ‘शरीर प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा’ पर आगमिक विवेचन करते हुए चतुर्विध धर्मसंघ को सम्बोधित किया। पूज्यप्रवर ने फरमाया कि अनंत काल की भवभ्रमण यात्रा में शरीर हमेशा आत्मा के साथ रहता है। जैन तत्त्व विद्या में औदारिक, वैक्रिय, आहारक, तैजस और कार्मण—ये पाँच प्रकार के शरीर बतलाए गए हैं।
पाँचों शरीरों की विशिष्टता और कार्मण की सूक्ष्मता–
१. कार्मण व औदारिक की भूमिका : आचार्यश्री ने फरमाया कि कार्मण शरीर सबसे सूक्ष्मतर और कर्म का शरीर है, जो जीव को संसार में भ्रमण कराता है। जब आत्मा स्व-स्वरूप में लीन होती है, तब इस पर कार्मण का वश नहीं चलता। केवल औदारिक शरीर की उपस्थिति में ही केवलज्ञान और केवलदर्शन की प्राप्ति सम्भव है, इसलिए यह उदार व विशिष्ट है।
२. आहारक शरीर का प्रयोजन: संज्ञी मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जिसे पाँचों शरीर प्राप्त हो सकते हैं। आहारक शरीर केवल विशेष योग्य एवं लब्धिसम्पन्न साधु को ही प्राप्त होता है, जो शंका समाधान के लिए दूत की भाँति केवली के पास जाकर उत्तर लाता है।
प्रत्याख्यान की श्रृंखला : कषाय, योग और शरीर–
१. सिद्धत्व का मार्ग : पूज्यश्री ने फरमाया कि मोक्ष की प्राप्ति के लिए शरीर प्रत्याख्यान आवश्यक है, परन्तु उससे पूर्व कषाय और योग का प्रत्याख्यान अनिवार्य है। कषाय का पूर्ण क्षय १२वें गुणस्थान में होता है।
२. परम शाश्वत सुख : मनुष्य भव चरम भव है जिसमें ये तीनों कार्य सम्पन्न होते हैं। शास्त्रानुसार शरीर के पूर्ण प्रत्याख्यान से जीव सिद्ध गुणों को प्राप्त कर लोकाग्र में स्थित हो जाता है। यह सुख शाश्वत है और देवों व इन्द्रों के सुख से भी परे है।
चित्त समाधि और शांतिपूर्ण सहवास के ३ सूत्र–
१. उपादान की मजबूती : आचार्यप्रवर ने विहार कर आए साधु-संतों की चित्त समाधि के सन्दर्भ में फरमाया कि भाव शुद्धि और उपादान मजबूत हो, तो बाहरी परिस्थितियाँ समाधि भंग नहीं कर सकतीं।
२. दैनिक जीवन का पाथेय : पूज्यश्री ने शांतिपूर्ण सहवास और जीवन के लिए तीन मुख्य सूत्र दिए—
१. सहन करना, २. औचित्यपूर्ण कहना और ३. शांति से रहना।
३. मध्यस्थ भाव : यदि वर्तमान में पूर्ण परम सुख की प्राप्ति सम्भव न हो, तो भी समता भाव रखते हुए सुख-दुःख, लाभ-अलाभ में मध्यस्थ रहकर जीवन को शांतिमय, वैराग्यमय और आनंदमय बनाया जा सकता है।
'ओम' (ॐ) की जैन व्याकरणिक व्याख्या : जानिए 5 पदों से कैसे सिद्ध होता है यह मंत्र!
पूज्य प्रवर ने 'ओम' (ॐ) शब्द की जैन दर्शन एवं संस्कृत व्याकरण के आधार पर अति सूक्ष्म और दार्शनिक व्याख्या फरमाई। उन्होंने स्पष्ट किया कि 'ओम' कोई सामान्य ध्वनि नहीं, बल्कि नमस्कार महामंत्र के पंच परमेष्ठी के प्रथम अक्षरों से सिद्ध हुआ परम मंगलकारी शब्द है।
1. पंच परमेष्ठी के 5 पदों का योग : आचार्य श्री ने बताया कि शब्द पंच परमेष्ठी के पावन पदों के प्रथम अक्षरों के मेल से बनता है:
अ — अरहत
अ — अशरीरी (सिद्ध भगवान)
आ — आचार्य
उ — उपाध्याय
म — मुनि
2. संस्कृत व्याकरण से शब्द की पूर्ण निष्पत्ति : आचार्य श्री ने संधि के नियमों का उदाहरण देते हुए इसकी रचना समझाई:
अरहत का 'अ' + सिद्ध (अशरीरी) का 'अ' मिलकर बनता है — 'आ'। यह 'आ' + आचार्य का 'आ' मिलकर 'आ' ही रहता है।
इसमें उपाध्याय का 'उ' जोड़ने पर (आ + उ) बनता है — 'ओ'। अंत में मुनि का आधा 'म' जुड़ने पर यह पूर्ण 'ओम' (ॐ) शब्द सिद्ध होता है।
3. अशरीरी सिद्ध एवं मंगलकारी स्वरूप:
आचार्य श्री ने विशेष रूप से उल्लेख किया कि सिद्ध भगवान को 'अशरीरी' कहा गया है, क्योंकि वे कर्ममुक्ति के पश्चात पूर्णतः शरीर-रहित अवस्था में विराजमान हैं। जैन परंपरा में 'ओम' का यह स्वरूप ग्रन्थ की निर्विघ्न समाप्ति और जीवन के सर्व मंगल के लिए अत्यंत पावन माना गया है।
'घर ने स्वर्ग बणावणो है? पढ़ लो आचार्य श्री रो यो मंतर!'
गृहस्थ परिवार हो या साधु-साध्वियों का संघ—आपसी शांति और सामंजस्य के लिए पूज्य प्रवर ने 'सहना, कहना और रहना' का अत्यंत व्यावहारिक सूत्र प्रदान किया है।
जीवन का त्रिसूत्री फार्मूला: आचार्य श्री ने इसे एक महत्वपूर्ण सूत्र के रूप में समझाया–
१. सहना : परिवार या संघ में सामंजस्य बनाए रखने के लिए थोड़ा सहन करना आवश्यक है। चाहे वह सास-बहू का संबंध हो या पिता-पुत्र का, असहिष्णुता ही विवादों का मूल कारण होती है।
२. कहना : केवल सहना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि मौके पर उचित समय देखकर अपनी बात को शिष्टता और औचित्य के साथ कहना भी आवश्यक है।
३. रहना : अंत में, इन सबके बीच शांति से साथ रहना ही जीवन की सार्थकता है।
असहिष्णुता का दुष्प्रभाव और निभाव की महत्ता : आचार्य जी ने स्पष्ट किया कि वर्तमान समय में चाहे गृहस्थों के परिवार हों या साधु-साध्वियों का संघ, 'असहिष्णुता' ही अशांति की सबसे बड़ी जड़ है। इसे कम करना ही समाधान का मार्ग है।
निभाव की महत्ता : पूज्य प्रवर ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि परस्पर 'निभाव' (एक-दूसरे को साथ लेकर चलना) ही संघ और परिवार की व्यवस्था को सुचारू रखता है। किसी भी परिस्थिति में धैर्य और समता बनाए रखना ही शांतिपूर्ण सहवास की कुंजी है।