गुरुवाणी/ केन्द्र
'काया की स्थिरता ही ध्यान का पहला द्वार' : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन विश्व भारती, लाडनूँ की पावन धरा स्थित सुधर्मा सभा में जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अधिशास्ता, अखण्ड परिव्राजक, महातपस्वी आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन सन्निधि में अनुशासन पर्व एवं हाजरी के सुअवसर पर विशाल अध्यात्म-सभा आयोजित हुई। पूज्यप्रवर ने 'रोकें काया की चंचलता' विषय पर चतुर्विध धर्मसंघ को पावन पाथेय प्रदान करते हुए संयम, विवेक और साधना की बारीकियों से अवगत कराया।
आठ प्रवचन माताएँ: प्रवृत्ति व निवृत्ति का संतुलन–
१. समिति व गुप्ति का आगमिक प्रयोजन : आचार्यश्री ने फरमाया कि साधु की साधना-चर्या में पाँच महाव्रत तथा आठ प्रवचन माताएँ (पाँच समितियाँ और तीन गुप्तियाँ) मुख्य हैं। समितियाँ चारित्रिक प्रवृत्ति और सक्रियता का प्रतीक हैं, जबकि गुप्तियाँ अशुभ योगों को रोकने (निवृत्ति) का माध्यम हैं। साधु को २४ घंटे अशुभ विषयों से निवृत्त रहना चाहिए।
२. चौदहवें गुणस्थान में गुप्तियाँ : आचार्यप्रवर ने समझाया कि साधना के सर्वोच्च १४वें गुणस्थान में कोई समिति काम नहीं करती क्योंकि वहाँ प्रवृत्ति समाप्त हो जाती है। अतः उस अवस्था में केवल तीन गुप्तियाँ— मनोगुप्ति, वचनगुप्ति और कायगुप्ति ही विद्यमान रहती हैं।
काय की चंचलता और कायोत्सर्ग की महत्ता–
१. मन की एकाग्रता का मार्ग : पूज्यश्री ने फरमाया कि चंचलता मन, वाणी और शरीर तीनों की होती है।
यदि मन की चंचलता को कम करना है, तो साधक को सबसे पहले शरीर की चंचलता रोकने का अभ्यास करना चाहिए। शरीर की स्थिरता स्वयं ध्यान का एक सशक्त आयाम है।
२. कायगुप्ति का स्वरूप : प्रेक्षाध्यान के प्रथम चरण कायोत्सर्ग में स्थिरता, शिथिलता और जागरूकता ही मुख्य हैं। शरीर को हिंसा, प्रमाद और अशुभ योगों से मुक्त रखना, तथा हाथों, पैरों, इन्द्रियों व वाणी का संयम ही वास्तविक कायगुप्ति है।
अनुशासन पर्व (हाजरी) और धर्मसंघीय मर्यादाएँ–
१. एक आचार्य की आज्ञा में निष्ठा : आचार्यप्रवर ने फरमाया कि आज हाजरी व अनुशासन पर्व का दिन है। आद्यप्रवर्तक स्वामी भिक्षु ने धर्मसंघ में मर्यादाएँ स्थापित की थीं, जिनमें सर्वोच्च यह है कि समस्त साधु-साध्वियाँ एक ही आचार्य की आज्ञा में रहें। विहार, चातुर्मास आचार्य-आज्ञा से ही करें और स्वयं शिष्य न बनाएँ।
२. श्रमण परंपरा की सम्यक् आराधना : पूज्यप्रवर ने फरमाया कि जो मुनि महाव्रतों व मर्यादाओं का प्रामाणिकता से पालन करता है, वही श्रमण परंपरा की सच्ची आराधना करता है। साधु-साध्वियों को सदैव चित्त समाधि में रहते हुए धर्मसंघ के गौरव के प्रति जागरूक रहना चाहिए।
लेखपत्र वाचन व धार्मिक प्रस्तुतियाँ–
१. लेखपत्र उच्चारण व बख्शीश : गुरुदेव की अनुज्ञा से मुनि हितकरजी व मुनि बालयोगीजी ने वार्षिक लेखपत्र का वाचन किया। पूज्यप्रवर ने मुनिद्वय को ३-३ कल्याणक की बख्शीश प्रदान की। तीन नई समणियों द्वारा समणी संबंधी पत्र का वाचन करने पर उन्हें २१ लोगस्स पाठ की बख्शीश मिली। तत्पश्चात समस्त चारित्रात्माओं ने सामूहिक रूप से खड़े होकर लेखपत्र का उच्चारण किया।
२. श्रद्धांजलि व संगान : कार्यक्रम में राणावास संस्थान के अध्यक्ष मोहनलाल गादिया ने अपने श्रद्धाभाव व्यक्त किए। शिक्षकों एवं विद्यार्थियों ने सुमधुर गीत का संगान कर पूज्य गुरुदेव के चरणों में अपनी भावनाएँ समर्पित कीं।