गुरुवाणी/ केन्द्र
'ज्ञान के साथ संस्कारों की शिक्षा ही बनाती है जीवन को श्रेष्ठ' : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, महातपस्वी, अणुव्रत अनुशास्ता आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में जैन विश्व भारती परिसर की सुधर्मा सभा में 'अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह' के समापन अवसर पर 'जीवन विज्ञान दिवस' का गरिमामय आयोजन हुआ।
ज्ञान का विकास और शिक्षा का महत्त्व–
१. चिंतन और निर्णय क्षमता का आधार : पूज्यप्रवर ने मुख्य मंगल प्रवचन में फरमाया कि शिक्षा जीवन का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तत्त्व है। जीवन में ज्ञान का विकास रहने से मनुष्य विवेकशील, अच्छी चिंतनशैली और प्रखर निर्णय क्षमता वाला बनता है।
२. वर्तमान शिक्षा परिदृश्य: आचार्यश्री ने फरमाया कि आज दुनिया में अनेक विद्यालय, महाविद्यालय व विश्वविद्यालय हैं जहाँ विद्यार्थी विद्या अर्जन कर रहे हैं। साधु-समुदाय में ज्ञान व शिक्षा की अविरल परंपरा विद्यमान है, वहीं गृहस्थ समाज में भी शिक्षा की सुंदर व्यवस्थाएँ संचालित हैं। वर्तमान समय में अतीत की तुलना में शिक्षा की उत्तम व्यवस्थाएँ हैं और लोगों का शिक्षा के प्रति रुझान भी बढ़ा है।
जीवन विज्ञान : अणुव्रत व प्रेक्षाध्यान का अनूठा संगम और संस्कारित शिक्षा–
१. असांप्रदायिक व लोक कल्याणकारी उपक्रम : पूज्य गुरुदेव ने फरमाया कि अणुव्रत और प्रेक्षाध्यान का समन्वित रूप ही 'जीवन विज्ञान' है। यह हमारे धर्मसंघ का लोक कल्याणकारी, व्यापक और असांप्रदायिक कार्यक्रम है। इसका मुख्य उद्देश्य शिक्षा जगत में केवल बौद्धिक ज्ञान ही नहीं, बल्कि संस्कारयुक्त शिक्षा प्रदान करना है।
२. भावों पर नियंत्रण और विकृतियों का शमन : जीवन विज्ञान के माध्यम से विद्यार्थियों का भावनात्मक विकास करना और क्रोध, अहंकार जैसी मानसिक विकृतियों पर नियंत्रण पाना प्रमुख लक्ष्य है। साधु-साध्वीवृंद बहिर्विहार के दौरान या सामान्य समय में विद्यालयों व जेलों आदि में कहानियों, दृष्टान्तों, महाप्राण ध्वनि और योगाभ्यास के प्रयोगों द्वारा बालकों में सहजता
से अच्छे संस्कारों का बीजारोपण कर सकते हैं।
३. शिक्षा के तीन प्रमुख आयाम : आचार्यश्री ने शिक्षा के तीन प्रमुख आयामों को रेखांकित करते हुए फरमाया कि पहला आयाम विश्वविद्यालयीन शिक्षा (जैसे B.A., M.A., Ph.D. आदि) है, दूसरा संघीय पाठ्यक्रम 'महाप्रज्ञ श्रुताराधना' है, तथा तीसरा महिला मंडल द्वारा संचालित 'तत्त्वज्ञान' का पाठ्यक्रम है।
विद्यार्थियों द्वारा महाप्राण ध्वनि की प्रस्तुति व संकल्प ग्रहण–
१. संस्कारों का बीजारोपण : कार्यक्रम में सेठ सूरजमल भूतोड़िया राजकीय कन्या विद्यालय एवं सुभाष चंद्र बोस इंग्लिश मीडियम स्कूल के छात्र-छात्राएँ तथा शिक्षकगण उपस्थित रहे। विद्यार्थियों ने भावपूर्ण अणुव्रत गीत का संगान किया तथा प्रार्थना सभा में होने वाले जीवन विज्ञान के उपक्रम 'महाप्राण ध्वनि' आदि की सुंदर प्रस्तुति दी।
२. अणुव्रत संकल्प त्रयी का स्वीकार : पूज्यप्रवर की प्रेरणा से विद्यार्थियों ने सद्भावना, नैतिकता और नशामुक्ति की संकल्प त्रयी को सहर्ष स्वीकार कर 'जीवन विज्ञान दिवस' के उद्देश्य को सार्थक किया।
English भाषा में सार-संक्षेप–
१. अंगेजी भाषा में प्रवचन सार: मुख्य प्रवचन के उपरांत आचार्यश्री के इंगित पर मुनि योगेश कुमार जी ने अंग्रेजी भाषा (English) में कहा 'Jeevan Vigyan bridges moral philosophy with practical discipline. Anuvrat instills ethical values, while Preksha Dhyan puts them into action. Through simple techniques like Mahapran Dhwani, which vibrates memory-related neurons, it sharpens focus and unlocks human potential.'
पूज्यश्री के पावन सम्बोधन का सुंदर सार प्रस्तुत किया। तत्पश्चात मुनि आर्ष कुमार जी ने भी अति संक्षेप में अंग्रेजी भाषा में भाव प्रस्तुत करते हुए कहा 'Jeevan Vigyan works at the deepest psychological levels to overcome Anger, Pride, Deceit, and Greed. Its practical tools transform habits and prioritize character building, making it a sacred legacy for universal peace and individual growth.
4 कड़वे सच, जो बदल देंगे आपका जीवन!
आचार्य श्री ने 'जीवन विज्ञान' के मूल मर्म को अत्यंत सरलता और स्पष्टता के साथ समझाया।
1. किताबी ज्ञान नहीं, आचरण का विज्ञान : आचार्य जी ने स्पष्ट किया कि जीवन विज्ञान केवल किताबों तक सीमित ज्ञान नहीं, बल्कि आचरण का विज्ञान है। उन्होंने इसे एक सरल महामंत्र में पिरोया– 'बुरा मत देखो • बुरा मत सुनो • बुरा मत बोलो • बुरा मत सोचो • बुरा मत करो'
2. सकारात्मकता ही असली 'आत्मा' : उन्होंने विद्यार्थियों और जनसामान्य को हमेशा सकारात्मकता अपनाने की प्रेरणा दी। आचार्य जी ने फरमाया कि बुराई के त्याग के साथ—हमेशा अच्छा सुनना, देखना, बोलना, सोचना और अच्छा काम करना—यही जीवन विज्ञान की वास्तविक 'आत्मा' है।
3. संस्कार निर्माण का सरल मार्ग: यह कोई कठिन या जटिल विद्या नहीं, बल्कि दैनिक व्यवहार में सकारात्मक बदलाव लाने का सरल तरीका है। यह संस्कार निर्माण का सबसे प्रभावी माध्यम है, जिसे बच्चे आसानी से अपने जीवन का हिस्सा बना सकते हैं।
4. अंतिम लक्ष्य—स्वभाव परिवर्तन : आचार्यजी ने 'स्वभाव परिवर्तन' को जीवन विज्ञान का अंतिम लक्ष्य बताया है, जहाँ व्यक्ति अपने विचारों और कार्यों के माध्यम से स्वयं को निरंतर बेहतर बनाता है।
7 PhDs एक तरफ, जयाचार्य जी का ज्ञान एक तरफ!
पूज्य प्रवर ने आचार्य भिक्षु और जयाचार्य जी के अगाध आगम-ज्ञान का उल्लेख करते हुए वास्तविक विद्वता का मर्म फरमाया।
१. बिना डिग्री के अगाध ज्ञान: पूज्य प्रवर ने फरमाया कि आचार्य भिक्षु, जयाचार्य जी और मुनि हेमराज जी के पास कोई आधुनिक 'डिग्री' (MA, PhD) नहीं थी, फिर भी उनका आगम और तत्वज्ञान इतना विशाल था कि आज के डिग्रीधारी विद्वान उनके सामने नगण्य प्रतीत होते हैं।
२. 7 PhDs से भी बड़ा आगम-ज्ञान : आचार्य श्री ने उदाहरण देते हुए फरमाया कि यदि आज के 7 पीएचडी धारक भी एक साथ बैठ जाएँ, तो भी वे जयाचार्य जी के अगाध आगम-ज्ञान की बराबरी नहीं कर सकते।
३. 'प्रोफेसर' शब्द भी छोटा : उन्होंने कहा कि आज की शब्दावली में उन्हें केवल 'प्रोफेसर' कहना उनके ज्ञान के साथ न्याय नहीं होगा; उनका पांडित्य किसी भी आधुनिक शैक्षणिक मानक से कहीं ऊँचा था।
४. साधना और चिंतन का बल: उस समय की शिक्षा पद्धति भले ही डिग्रियों वाली नहीं थी, लेकिन साधना, गहरे अध्ययन और चिंतन पर आधारित वह प्रणाली स्वयं में विशिष्ट ज्ञान का सर्वोच्च मानक थी।
'90 साल पहले का वो दौर... और आज यूनिवर्सिटीज में गूंजती आवाज़!'
पूज्य प्रवर ने शिक्षा के क्षेत्र में आए सकारात्मक बदलावों और साधु-साध्वी समुदाय की शैक्षणिक प्रगति पर विस्तार से चर्चा की–
1. शिक्षा का तुलनात्मक विकास (90 साल का सफर) : आचार्यश्री ने 90 वर्ष पहले और वर्तमान समय की तुलना करते हुए बताया कि उस समय साधु-साध्वी समुदाय में अंग्रेजी भाषा, आधुनिक डिग्री (जैसे MA, डॉक्टरेट) या शैक्षणिक संस्थानों में जाकर भाषण देने की परंपरा न के बराबर थी।
2. आधुनिक शिक्षा और साधु-साध्वी (विशिष्ट बदलाव) : आज के समय में साधु-साध्वी और समणियों का शैक्षणिक स्तर काफी विकसित हुआ है। अब वे न केवल उच्च शिक्षित हैं, बल्कि अंग्रेजी में संवाद करने, शोध करने और शिक्षण (Teaching) जैसे क्षेत्रों में भी सक्रिय हैं। उन्होंने उल्लेख किया कि आज हमारे बीच अनेक डॉक्टरेट, सीए (CA), और वकील हैं, जो एक बड़ा परिवर्तन है।
3. गुरुदेव तुलसी का ऐतिहासिक योगदान : आचार्यश्री ने विशेष रूप से गुरुदेव तुलसी के प्रयासों को रेखांकित किया। उन्होंने बताया कि किस प्रकार परम पूज्य कालूगणी के समय से चली आ रही मर्यादाओं के बीच, गुरुदेव तुलसी ने शिक्षा के महत्व को समझा और साध्वी समुदाय में आधुनिक शिक्षा और अंग्रेजी भाषा के ज्ञान को प्रोत्साहित किया।
4. भाषण और ज्ञान-प्रसार (बड़ी उपलब्धि) : साध्वियों द्वारा अब कॉलेज, यूनिवर्सिटी और स्कूलों में जाकर हिंदी व अंग्रेजी में भाषण देना और ज्ञान का प्रसार करना, समाज के लिए एक बड़ी उपलब्धि है।