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अर्हत् वंदना और काय स्थिरता से साधें मन-काया की एकाग्रता’ : आचार्यश्री महाश्रमण
जैन श्वेतांबर तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशमाधिशास्ता, भगवान महावीर के प्रतिनिधि, अहिंसा यात्रा प्रणेता, युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमण जी की पावन सन्निधि में धर्मसंघ को आध्यात्मिक गहराई से ओतप्रोत करने वाला पावन पाथेय प्राप्त हुआ। पूज्यप्रवर ने 'योग प्रत्याख्यान से क्या मिलेगा?' विषय पर अत्यंत दार्शनिक और आगमिक उद्बोधन प्रदान करते हुए योग, संवर और अयोग अवस्था के रहस्यों का उद्घाटन किया।
योग का शाब्दिक व जैन दर्शन में पारिभाषिक स्वरूप–
१. अनेकार्थक योग और आचार्य हेमचंद्र का कथन : पूज्यप्रवर ने मंगल प्रवचन में फरमाया कि 'योग' शब्द अनेकार्थक है और साधना के संदर्भ में भी व्यवहृत होता है। आचार्य हेमचंद्र के अनुसार मोक्ष का उपाय योग है, जिसका स्वरूप ज्ञानात्मक, श्रद्धानात्मक और चारित्रणात्मक होता है। संपूर्ण धर्म साधना योग है क्योंकि यह आत्मा को मोक्ष से जोड़ती है।
२. शारीरिक, वाचिक और मानसिक प्रवृत्ति : जैन दर्शन में 'योग' एक पारिभाषिक शब्द है, जिसके अंतर्गत शरीर, वाणी और मन की प्रवृत्ति को योग कहा गया है। प्रवृत्ति चाहे आस्तिक करे, नास्तिक करे या कोई भी जीव मात्र करे, वह योग ही है। तत्त्व की दृष्टि से स्थावर जीवों में केवल काय योग, विकलेन्द्रियों में काय व वचन योग, तथा देवों, नारकों, संज्ञी मनुष्य व पंचेन्द्रिय तिर्यंचों में मन, वचन और काया तीनों योग होते हैं।
३. संज्ञी प्राणियों की महत्ता : मन वाले (संज्ञी) प्राणी ही सबसे ज्यादा धर्म और सबसे ज्यादा पाप कर सकते हैं, जो विकलेन्द्रिय या स्थावर जीव नहीं कर सकते। सातवीं नरक जाने से लेकर मोक्ष प्राप्ति तक का सामर्थ्य संज्ञी मनुष्य में ही होता है।
योग प्रत्याख्यान: योग से अयोग की ओर यात्रा–
१. अयोगवस्था और चौदहवां गुणस्थान : आचार्यश्री ने समझाया कि 'योग प्रत्याख्यान' का अर्थ है योग से अयोग की ओर आगे बढ़ना— अर्थात मन, वचन और शरीर की प्रवृत्ति का पूर्ण निरोध, क्योंकि जब तक योग रहेगा, मोक्ष नहीं मिलेगा। अयोग संवर की पूर्ण अवस्था मात्र चौदहवें गुणस्थान में प्राप्त होती है।
२. शैलेषी अवस्था व अकर्मबंध : चौदहवें गुणस्थान में किसी भी प्रकार की प्रवृत्ति न होने के कारण 'अबंध' अवस्था रहती है और जीव मेरु पर्वत की भाँति अकंप, 'शैलेषी अवस्था' को प्राप्त कर लेता है। यहाँ मन, वचन और काया की चंचलता पूर्णतया समाप्त हो जाती है, शुक्ल ध्यान की पराकाष्ठा में पूर्ण स्थिरता होती है और नए कर्मों का बंध रुककर पूर्वबद्ध कर्मों की निर्जरा से जीव अल्पकाल में सिद्धत्व को प्राप्त हो जाता है।
आंशिक योग प्रत्याख्यान और अर्हत् वंदना का प्रायोगिक अभ्यास–
१. आंशिक साधना का प्रयोग : पूज्यप्रवर ने फरमाया कि यद्यपि चौदहवें गुणस्थान की पराकाष्ठा अनंत जन्मों में एक बार अति अल्पकाल के लिए आती है, किंतु हम आंशिक योग प्रत्याख्यान बार-बार कर सकते हैं। शरीर, वाणी और मन की चंचलता को स्थूल रूप से रोकने का प्रयास कर अयोग की आंशिक साधना की जा सकती है।
२. काय स्थिरता का प्रयोग : आचार्यश्री ने वंदनासन में बैठकर मेरुदंड और गर्दन सीधी रखकर, हाथों को स्थिर और आँखें बंद कर आगम के पाठों के वाचन को काय स्थिरता का सुंदर प्रयोग बताया। पूज्यप्रवर के निर्देश पर सभा में उपस्थित संघ ने भावभीनी वंदना के संगान के साथ इसका प्रायोगिक अभ्यास भी किया, जिससे निर्जरा का उत्तम लाभ प्राप्त होता है।
'अर्हत वंदना: सिर्फ औपचारिक नमन नहीं, आत्म-विशुद्धि की अचूक कुंजी!'
पूज्य प्रवर ने फरमाया कि अर्हत वंदना में व्यतीत समय केवल औपचारिकता न बनकर ध्यान और कर्म-निर्जरा का माध्यम बन सकता है।
अर्हत वंदना का सही तरीका और मुख्य बिंदु–
1. कायिक स्थिरता: वंदनासन में बैठें, मेरुदंड (रीढ़ की हड्डी) और गर्दन को सीधा रखें।
2. पूर्ण एकाग्रता : हाथों की स्थिरता बनाए रखें और मन को भटकने न दें। वंदना के समय पूर्ण तल्लीनता आवश्यक है।
3. दृष्टि संयम : ध्यान को एकाग्र रखने के लिए आंखों को स्थिर रखें या बंद कर लें।
4. भावपूर्ण वंदना : 'भावभीनी वंदना....' केवल पाठ बोलना पर्याप्त नहीं है, बल्कि भगवान के गुणों का चिंतन करते हुए भीतर शुद्धता व निर्मलता का अनुभव करना अनिवार्य है।
5. ऐतिहासिक संदर्भ : अर्हत वंदना का यह क्रम युगप्रधान आचार्य तुलसी के समय प्रारंभ हुआ था। कालान्तर में आचार्य श्री महाप्रज्ञ जी के समय इसमें 'श्रद्धा स्वीकारो' का पावन सूत्र जोड़ा गया। यह हमारे धर्मसंघ का एक महत्वपूर्ण सामूहिक अनुष्ठान है, जिसमें प्रत्येक श्रावक-श्राविका को सक्रिय रूप से सहभागी बनना चाहिए।
आचार्य श्री के पावन कंठ से झरा 'भावभीनी' का अमृत
जब आचार्य प्रवर के श्रीमुख से यह पावन गीत के स्वर फूटे, तो पूरा वातावरण मानो दिव्यता और शांति के समंदर में डूब गया। यह रचना केवल शब्दों की श्रृंखला नहीं है, बल्कि हर साधक के भीतर सोई हुई चेतना को झकझोर कर जगा देने वाली एक अंतरात्मा की पुकार है—
भाव भीनी वंदना भगवान चरणों मे चढ़ाएं।
शुद्ध ज्योतिर्मय निरामय, रूप अपने आप पाएं ॥
ज्ञान से निज को निहारें, दृष्टि से निज को निखारें।
आचरण की उर्वरा मे, लक्ष्य तरुवर लहलहाएं ॥१॥
सत्य में आस्था अचल हो, चित्त संशय से न चल हो।
सिद्धकर आत्मानुशासन, विजय का संगान गाएं ॥२॥
बिन्दु भी हम सिन्धु भी है, भक्त भी भगवान भी हैं।
छिन्न कर सब ग्रंथियों को, सुप्त-चेतन को जगाएं ॥३॥
धर्म है समता हमारा, कर्म समतामय हमारा।
साम्य योगी बन हृदय में, स्रोत समता का बहाएं ॥४॥
आंतरिक अनुभूति: यह गीत हमें याद दिलाता है कि हम बाहर क्या तलाश रहे हैं? हम खुद ही बिंदु भी हैं और सिंधु भी। जब भीतर का संशय मिटता है और आचरण की धरती पर समता का झरना बहता है, तभी जीवन की असली सार्थकता खिल उठती है।