तीर्थंकरों की भक्ति और आत्मिक ऊर्जा का संचार

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तीर्थंकरों की भक्ति और आत्मिक ऊर्जा का संचार

साध्वी सोमयशाजी के सान्निध्य में स्थानीय तेरापन्थ सभा भवन में 'पच्चीस कंठी रक्षा कवच दिव्य अनुष्ठान ' एक दिव्य अनुष्ठान करवाया गया । इसमें तीर्थंकर जप एवं स्तुति के साथ अपने रक्षा कवच का सृजन है। इस अनुष्ठान से भाई - बहनों ने आत्मिक शांति , मानसिक स्थिरता और आध्यात्मिक ऊर्जा का गहन अनुभव किया। साध्वी ने नमस्कार महामंत्र से संकल्पों के साथ अनुष्ठान का शुभारंभ किया। 24 तीर्थंकरों की स्तुति से युक्त एक अद्भुत अनुष्ठान बताया। आत्म जागरण का जैन साहित्य में 24 तीर्थंकरों का जीवन चरित्र पूरे विस्तार के साथ वर्णित है। तीर्थंकर जैसा बोलते है वैसा ही करते है। और जैसा करते है वैसा ही बोलते है। इसीलिए उनके जीवन में किसी प्रकार की विसंगति नहीं होती है। जिस परिसर में अर्हंत् देव विराजमान रहते है । वहा से 125 योजन तक में ज्वर रोग, विरोध, भतिवृष्टि, अनावृषटि, उत्रिसी आदि नहीं होती है। इसीलिए वे जन - जन के तारक है। त्रिलोकीनाथ है। महामानव है। पुरुषोत्तम है। विभिन्न अतिशयों से युक्त है। उनका बताया हुआ मार्ग किसी समुदाय विशेष के लिए नहीं है। अपितु सर्वजन हिताय है। इरोड के सभी भाई - बहनों ने बड़े उत्साह से इस अनुष्ठान में भाग लिया।