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निःस्वार्थ समर्पण और सकारात्मक चिंतन से ही मिलता है सच्चा आनंद
(प्रदीप छाजेड़ द्वारा विचार) भारतीय दर्शनशास्त्र का यह तथ्य है जो सत्य है कि अगर कुछ पाने की लालसा रखेंगे तो दुःख व निराशा का स्वाद चखेंगे। वह इसके विपरीत यदि देने का भाव रखेंगे तो सदा सुख व आनन्द से सरोबार रहेंगे। यह जीवन का एक अजब दर्शन ही है। इसे बहुत कम लोग समझते हैं। इसीलिए उनके लिए यह एक प्रश्न ही है लेकिन जो समझ लेते हैं वे तो मालामाल हो जाते हैं। आदमी सुनकर कल्याण को जानता हैं। वह सुनकर पाप को भी जान लेता हैं। विशेष बात यह हैं कि दोनों को जानकर जो श्रेय हों, हितकर हों, उसका समाचरण करने का प्रयास हमारे द्वारा होना चाहिए। मनुष्य के पास पाँच इन्द्रियाँ होती हैं। ये पाँच इन्द्रियाँ ही सही से माध्यम बनकर आदमी को ज्ञान भी कराती हैं और भोग भी कराती हैं। श्रोतेन्द्रिय और चक्षुरीन्द्रिय बाहर से ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम माध्यम बनती हैं। प्रवचन के श्रवण करने से भी ज्ञान की वृद्धि हो सकती हैं। वह किसी के बोलने से भी ज्ञान प्राप्त हो सकता हैं। शिक्षक बोलकर विधार्थियों को ज्ञान प्रदान करते हैं। अच्छी बातों के श्रवण से मानों कान धन्य हो जातें हैं। किसी दुःखी व्यक्ति की व्यथा कोई अच्छा आदमी सुन ले तो सामने वाले को थोड़ी राहत मिल सकती हैं।
कान में कोई कुण्डल आदि आभूषण धारण करना कान की बाहरी शोभा हो सकती हैं, परन्तु कान से धर्म, अध्यात्म, शास्त्रों आदि की बातें सुनना कान का धार्मिक- भीतरी आभूषण हैं। आँखों से भी ज्ञान प्राप्त होता हैं। अतः हमें आँखो से अच्छी धार्मिक आध्यात्मिक पुस्तकें आदि पढ़नी चाहिए। वह जिससे उत्तम ज्ञान प्राप्त हो सकता हैं। इस प्रकार श्रोत और चक्षु से हमें विविध प्रकार का ज्ञान प्राप्त हो सकता है। हमको कानों से सुनकर वह आँखो से देखकर अच्छा ज्ञान ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। हम आचार्य भिक्षु त्रिशताब्दी वर्ष पर वह आगे भी आचार्य भिक्षु के वह आगम आदि अन्य आचार्यों साधु - संतों के साहित्य को पढ़े तो हमारा कल्याण हो सकता हैं। मस्तिष्क तरंगों का समुद्र है जिसमें अनवरत लहरें उत्तेजित या मंद अपनी ही रवानी में मस्त हो उठती रहती हैं। हमारे चिंतन का रंग जैसे रंग का चश्मा होता हैं वैसे ही सकारात्मकता का या नकारात्मकता का होता हैं। वह इसमें सृजन का या विध्वंस का, ईर्ष्या का या प्रमोद भाव का, मित्रता का या रंजिश का, इंसानियत का या वैहषिपन का आदि समावेश होता हैं। यह हमारे सब रहन सहन और परवरिश पर और आहार निहार आदि पर निर्भर होता हैं। अतः हम श्रेय और हितकर को ग्रहण करने का प्रयास करें। यही हमारे लिए काम्य हैं.